एक भाई की वासना -13

(Ek Bhai Ki Vasna-13)

This story is part of a series:

सम्पादक – जूजा जी
हजरात आपने अभी तक पढ़ा..
फैजान तो सो रहा था.. लेकिन उसकी बहन को ज़रूर उसके हाथ अपनी कमर की साइड पर महसूस हो रहा था.. जिसकी वजह से वो थोड़ा सा बैचेन सी हो रही थी। लेकिन फिर भी वो आराम से लेटी रही.. क्योंकि मैंने उसके जिस्म पर से अपना हाथ नहीं हटाया था।

अब पोजीशन यह थी कि फैजान मेरे साथ चिपका हुआ था और मैं उसकी बहन के साथ चिपक कर सोने लगी थी।

मैंने आहिस्ता से दोबारा उसके कान के क़रीब अपनी होंठ लिए. जाकर कहा- शर्मा क्यों रही हो.. कल को तुम्हें भी तो ऐसी ही सोना है ना..

जाहिरा ने चौंक कर मेरी तरफ देखा तो मैंने उसके गोरे-गोरे गाल की एक पप्पी ली और बोली- हाँ.. तो क्या तुम अपने शौहर के साथ चिपक कर नहीं सोया करोगी क्या?
मेरी बात सुन कर जाहिरा शर्मा गई और अपनी आँखें बंद कर लीं।

एसी की ठंडी-ठंडी हवा में कुछ ही देर में हम सबकी आँख लग गई। मैंने भी करवट ली और अपने शौहर के साथ चिपक कर एक बाज़ू उसकी ऊपर डाल कर सो गई।
अब आगे लुत्फ़ लें..

बहुत सुबह जब मेरी आँख खुली तो हमारी हालत यह थी कि मैं जाहिरा की तरफ मुँह करके लेटी हुई थी। मेरा एक हाथ उसके सीने पर था। उसकी चूचियाँ मेरी बाज़ू के नीचे थीं। फैजान का बाज़ू मेरे ऊपर से होकर मेरी चूची को थामे हुए था। उसकी एक टाँग मेरी टाँगों के ऊपर से गुज़र रही थी और जाहिरा की टाँग पर पहुँची हुई थी।

इस हालत को देख कर मैं मुस्करा दी.. दोनों बहन-भाई अभी तक सोए हुए थे। कमरे से बाहर हल्की-हल्की रोशनी हो रही थी.. अभी लेकिन दिन नहीं चढ़ा था।

मेरी नींद टूट चुकी थी.. मैंने आहिस्ता से अपने हाथ को हरकत दी और सोई हुई जाहिरा का एक मुम्मा अपनी हाथ में ले लिया.. उसे आहिस्ता से सहलाने लगी।
जाहिरा ने नीचे से ब्रा भी पहनी हुई थी उसकी चूची बहुत ही सॉलिड लग रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता मैं उसे सहलाने और दबाने लगी। उसकी चूची को दबाना मुझे अच्छा लग रहा था।

उसका खूबसूरत गोरा-चिट्टा चेहरा मेरी आँखों के सामने और मेरे होंठों के बहुत ही क़रीब था। मैं ज्यादा देर तक खुद पर कंट्रोल ना कर सकी और उसकी चिकने गाल को एक किस कर लिया।

मेरे जागने के साथ ही मेरे अन्दर का शैतान भी जाग चुका था.. मुझे एक शैतानी ख्याल आया और साथ ही मेरी आँखें कमरे के उस अँधेरे में भी चमक उठीं।
ुमैंने एक नज़र जाहिरा के चेहरे पर डाली.. वो सो रही थी। फैजान के सोने का तो उसके खर्राटों से ही कन्फर्म हो रहा था।

अब मैंने अपनी चूचियों पर लटक रहा फैजान का हाथ अपने हाथ में लेकर उठाया और बहुत ही आहिस्ता से उसे जाहिरा की चूची पर रख दिया.. हाथ तो मैंने फैजान का रखा था.. जाहिरा की चूची पर.. लेकिन इस चीज़ के मजे की वजह से सिसकारी मेरी मुँह से निकल गई “’सस्स्स्स्स्…’
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फैजान का हाथ जाहिरा की चूची पर रखने के बाद मैंने फ़ौरन ही जाहिरा के चेहरे की तरफ देखा.. लेकिन वो बेख़बर सो रही थी।
फैजान का हाथ भी अपनी बहन की चूची के ऊपर बिल्कुल सटा हुआ था। उस बेचारे को तो पता भी नहीं था कि उसके हाथ में उसके ख्वाबों की ताबीर मौजूद है।
मैं धीरे से मुस्करा दी..

अब मैंने अपना हाथ फैजान के हाथ के ऊपर रखा और आहिस्ता-आहिस्ता उसके हाथ को जाहिरा की चूची के ऊपर फेरने लगी।
यह खेल मैं ज्यादा देर तक ना खेल सकी क्योंकि एक बार फिर मेरी आँख लग गई।

सुबह जब मेरी आँख खुली तो उस वक़्त फैजान ने दूसरी तरफ करवट ली हुई थी और मैं उसकी कमर के साथ उसी की तरफ मुँह करके उससे चिपक कर लेटी हुई थी.. मेरा बाज़ू उसके ऊपर था।
जाहिरा उठ कर जा चुकी हुई थी। मैं सीधी होकर लेट गई और रात जो कुछ हुआ.. उसके बारे में सोचने लगी।
मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट फैली हुई थी।

इतनी में जाहिरा ट्रे में चाय के तीन कप ले आई।
उसे देख कर मैं मुस्कुराई और वो मेरे पास ही बिस्तर पर लेटते हुए बोली- भाभी आप तो भैया के साथ चिपक कर बहुत ही बेशर्मी के साथ सोती हो.. सुबह भी आप उनके साथ चिपकी हुई थीं।

मैंने उसे आँख मारी और बोली- सारी रात तो तेरा भाई मेरे साथ चिपका रहा है.. थोड़ी देर के लिए मैंने चिपक लिया तो क्या हो गया यार?
मेरी बात सुन कर वो हँसने लगी। फिर मैंने फैजान को भी उठाया और हम तीनों ने चाय ली और गप-शप भी करते रहे।

ऐसे ही इसी रुटीन में 3-4 दिन गुज़र गए। रात को जाहिरा हमारे ही कमरे में हमारे बिस्तर पर हमारे साथ सोने लगी।

एक रात जब जाहिरा लेटने के लिए आई.. तो हम दोनों भी अभी जाग ही रहे थे।

हम तीनों लेट कर बातें करने लगे। थोड़ी ही देर गुज़री कि मैंने करवट बदली और फैजान की तरफ मुँह करके लेट गई और साथ ही उसके ऊपर अपना बाज़ू डालती हुए उसे हग कर लिया।
फैजान आहिस्ता से बोला- यार जाहिरा है, तेरे पीछे लेटी हुई है।

लेकिन मैंने उसका ख्याल किए बिना ही अपनी टाँग भी उसके ऊपर रखी और मज़ीद उससे लिपटते हुए बोली- कुछ नहीं होता.. उसे क्या पता.. वो तो अभी बच्ची है।

मैंने मुड़ कर जाहिरा की तरफ देखा तो उसकी चेहरे पर शर्मीली सी मुस्कराहट थी।

कुछ देर के बाद मैंने जाहिरा की तरफ अपना मुँह किया और उसे हग कर लिया और बोली- सॉरी जाहिरा डियर.. तुमने माइंड तो नहीं किया ना?
वो मुस्करा दी और बोली- नहीं भाभी इट्स ओके..

मैंने फैजान का भी हाथ खींचा और अपने ऊपर रख लिया।
अब वो पीछे से मुझे हग किए हुए था और मैंने सीधी लेटी हुई जाहिरा को हग किया हुआ था, फैजान का हाथ जाहिरा के पेट को छू रहा था।
मैंने महसूस किया कि जाहिरा को अपने भाई का हाथ थोड़ा बेचैन कर रहा है।

मुझे एक शरारत सूझी.. मैंने फैजान का हाथ पकड़ कर जाहिरा के पेट पर रखा और बोली- देखो फैजान जाहिरा का पेट कितना सपाट है.. और मेरा पेट कितना मोटा हो गया है.. देखो जाहिरा इसे फील करके..

मेरी इस हरकत से दोनों बहन-भाई ही चौंक पड़े.. लेकिन मैंने फैजान को हाथ हटाने का मौका दिए बिना ही उसके हाथ को जाहिरा के पेट पर फेरना शुरू कर दिया।

जाहिरा का चेहरा शरम से सुर्ख हो गया था। फैजान का भी मुझे पता था कि वो ऊपर से तो संकोच दिखा रहा है.. लेकिन अन्दर से वो अपनी बहन के पेट को छूना ज़रूर चाहता है।
लेकिन चंद लम्हों के बाद मैंने फैजान के हाथ पर से अपना हाथ हटाया तो फिर भी फैजान ने कुछ देर तक के लिए अपना हाथ जाहिरा के पेट पर ही पड़ा रहने दिया।

उस रात को मेरी आधी रात को आँख खुली तो मुझे टॉयलेट जाने की ज़रूरत पड़ी। मैं अपनी जगह से उठी और उन दोनों बहन-भाई के बीच में से निकली और उठ कर वॉशरूम में चली गई।

जब मैं वापिस आई तो अचानक ही मेरे ज़हन में एक ख्याल आया। मैंने जाहिरा को देखा.. तो वो गहरी नींद में थी। मैंने आहिस्ता से उसे करवट दी तो वो घूम कर बिस्तर पर मेरी वाली जगह पर अपने भाई फैजान के क़रीब आ गई।
मैं मुस्कराई और जाहिरा को अपनी जगह पर करके खुद उसकी वाली जगह पर लेट गई।

अब मुझे सोना नहीं था बल्कि आगे जो होने वाला था.. उसका इंतज़ार करना था।

आप सब इस कहानी के बारे में अपने ख्यालात इस कहानी के सम्पादक की ईमेल तक भेज सकते हैं।
अभी वाकिया बदस्तूर है।
[email protected]

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