इत्तेफाक से जेठ बहू के तन का मिलन-2

(Incest Kahani: Ittifaq Se Jeth Bahu Ke Tan Ka Milan-2)

मेरी सेक्स स्टोरी के पहले भाग
इत्तेफाक से जेठ बहू के तन का मिलन-1
में आपने पढ़ा कि मैं, मेरा भाई और उसकी पत्नी एक स्टेज शो की तैयारी कर रहे थे कि मेरे भाई का एक्सीडेंट हो जाने के कारण वो इस शो में भाग नहीं ले रहा था. मैं अपने छोटे भाई की बीवी के साथ एक होटल में रुका था.

थोड़ी देर बाद उस गेस्ट हाउस का मैनेजर आया और एक कमरे की चाभी देते हुए बोला कि कम्पनी ने सभी कन्टेस्टेन्ट को एक रूम प्रोवाईड किया है ताकि आप अपनी प्रेक्टिस बिना किसी डिस्टर्ब के कर सकें।

हम दोनों अपने कमरे में पहुंचे। कमरा बहुत खूबसूरत था; डबल बेड रूम था। कमरे के अन्दर पहुंचते ही मैं तो पसर गया। सिंधु फ्रेश होने चली गयी।
जब वो अपने कामों से फारिग हो गयी तो वो मुझे जगाने आयी।

उसके झकझोरने से मेरी नींद टूटी, वो हल्की सी मेरे ऊपर झुकी हुयी थी। उसके जिस्म से बहुत ही अच्छी खुशबू आ रही थी। उसने इस समय शलवार-सूट पहना हुआ था और अपने गीले बालों को सुखाने के लिये तौलिया लपेट लिया था।

मुझे जगाते हुए मुझसे बोली- भईया जाईये फ्रेश हो जाईये। थोड़ा चलिये बाहर घूम कर आते है।
उसकी शादी से आज तक उसने मुझे इस तरह छुआ नहीं था।

उसकी बात न टालते हुए मैं उठा और नहाने चला गया। अभी तक मुझे यह नहीं मालूम था कि वो सपना सपना नहीं था, सच था। और वो लड़की कोई और नहीं सिंधु थी।
मैं झट बाथरूम में घुसा और फ्रेश होने बैठ गया, फिर ब्रश करने के बाद जैसे ही नहाने बैठा तो मेरी नजर सिंधु के कपड़े पर जाकर टिक गयी। न चाहते हुए भी मैंने बारी बारी से उसके कपड़े उठाकर देखे। मुझे उसकी पैन्टी के अलावा बाकी सभी कपड़े दिखाई पड़ रहे थे।

फिर अचानक मेरी नजर उसके पेटीकोट पर पड़ी, जहां कुछ धब्बे जैसा दिखाई दे रहा था। मैंने उठाकर देखा तो वो धब्बे उसके वीर्य का था जो अब सूख चुका था और कड़क सा हो गया था। फिर मेरा ध्यान अपनी चड्डी की तरफ गया, मेरी चड्डी पर वीर्य का धब्बा लगा हुआ था और वो भी सूख चुका था।

तभी सिंधु की आवाज ने मेरी तंद्रा तोड़ी, वो बोल रही थी- भईया जल्दी कीजिए और अपने कपड़े छोड़ दीजिएगा, मैं धो दूंगी।

लेकिन मैंने उसकी बात को अनसुनी किया और नहाने के साथ अपने कपड़े धो लिये।

बाथरूम भी काफी बड़ा था और उसके बाहर थोड़ी छोटी बालकनी थी, मैंने वहां जाकर कपड़े फैला दिये। मेरे नहाने तक रूम सर्विस ने चाय नाश्ता पहुंचा दिया और साथ ही बोला- अगर आप लोगों को कहीं घूमने जाना हो तो नीचे रिसेप्शन पर बोल दीजियेगा, आपके लिये कैब तैयार रहेगी।
सिंधु ने तुरन्त ही उसको बोला- भईया, हम लोग दिल्ली घूमने जाना चाहते हैं।
“तो ठीक है मैडम, आप लोग नाश्ता करने के बाद जल्दी से नीचे आ जाइये। हाँ… आप लोगों को 1 बजे तक आ भी जाना है, क्योंकि काफी लोग हैं।
“ठीक है!” हमने कहा और फिर नाश्ता करने के बाद जल्दी से हम लोग नीचे रिसेप्शन पर पहुंच गये।

नीचे कई सारी कैब लगी थी। कैब में पहले सिंधु बैठी फिर मैं आगे की सीट पर बैठने लगा तो सिंधु ने मुझे पीछे अपने पास बैठने के लिये कहा। उसकी बात मानते हुए मैं पीछे बैठ गया, वो मुझे थोड़ा सट कर बैठ गयी और बाहर की सीन को देखते हुए मुझे उसको बताने लगी।

हम लोग घूमकर वापिस होटल आ चुके थे। अभी हमारे शो को तीन दिन थे इसलिये मैंने सिंधु से कहा- आज आराम कर लेते है, कल से प्रेक्टिस करेंगे।
वो भी मान गयी और दोपहर का लंच करने के बाद हम लोग अपने कमरे में पहुंचे तो मैं सोफे पर लेट गया और कब मुझे नींद आ गयी पता ही नहीं चला।

शाम को करीब छ: बजे तक मेरी नींद खुली तो पाया कि सिंधु अभी भी सो हुयी है और उसकी पीठ मेरी तरफ है और उसका कुर्ता जो है वो ऊपर की तरफ उठ गया है, उसकी पीठ खुली हुयी है। मैं उसके पास उसके कुर्ते को सही करने पहुंचा तो मेरे कदम ठिठक गये और मेरी नजर उसके चूतड़ों से हट ही नहीं रही थी। उसका पजामा काफी हद तक पारदर्शी था इसलिये मेरी नजर उसके गोल गोल कूल्हों पर जाकर टिक गयी जो कसी हुई पैन्टी के बीच फंसी हुयी थी।
मैं एक तरह से शून्य स्थिति में था.

तभी मैंने अपने सिर को झटका दिया और वापिस सोफे पर जाकर यह सोचकर लेट गया कि सिंधु के उठने के बाद ही उठूंगा।

तभी अचानक डोर बेल बची लेकिन मैं नहीं उठा, दो तीन बार बजने पर सिंधु की नींद खुली, उसने मुझे देखा, अपने कपड़े सही किये और दुपट्टा डालकर दरवाजा खोलने चली गयी।

रूम सर्विस इन्फॉर्म करने आया था कि करीब 8 बजे सभी कन्टेस्टेन्ट को अपनी परफॉर्मेन्स दिखानी है।
मैं उठा और नहाने धोने चल दिया।

मेरे बाद सिंधु भी नहाने के लिए अन्दर चली गयी।
नहाकर आने के बाद बोली- भईया, मैंने आपसे बोला था कि आप अपने कपड़े मत धोना, लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। अगली बार मत करियेगा।
“ओ के!” मैंने बात खत्म करते हुए बोला।

फिर मैं बाहर चला गया और सिंधु तैयार होने के लिये रूक गयी। सिंधु की भावना और मेरी भावना समान रूप से रूकी हुयी थी। न वो अपनी भावना का इजहार कर रही थी न ही मै। खैर जो थीम हमें दी गयी थी, उस थीम के अनुसार हमें तैयार होना था। मुझे हाफ जैकेट और धोती पहननी थी और सिंधु को साड़ी पहननी थी, लेकिन दिक्कत यह थी कि सिंधु को ब्लाउज नहीं पहनना था। मतलब उसके मम्मे आजाद रहेंगे बस साड़ीनुमा पर्दे से ढके हुए होंगे।

इस बीच मैं कॉरीडोर में टहलता रहा।

तभी दरवाजा खुला और सिंधु बाहर आयी। उसके इस रूप को देखकर मेरी आँखे खुली की खुली रह गयी। परफॉर्मेन्स कुछ इस तरह का था कि मैं सिंधु का पति हूँ। गाने में सीन कुछ इस तरह है कि सिंधु मुझे मनाने के लिये सब कुछ करने के लिये तैयार है और उसका यह पहनावा मर्यादित होने के साथ-साथ मुझे अपनी तरफ आकर्षित करना भी है।

खैर हम लोग हॉल में बैठकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बाकी सभी से परिचय सुबह तो हो ही चुका था, पर फिर भी सभी मर्दों की नजर सिंधु पर ही थी। सभी ललचायी नजरों से सिंधु को देख रहे थे, मेरी भी नजर चोरी-चोरी सिंधु की ही तरफ थी.
पर उस हॉल में काम देवियों की कोई कमी नजर नहीं आ रही थी इसलिये मेरी नजर भी सभी जगह फिसल रही थी।

करीब साढ़े दस बजे के आस-पास हमारी परफॉर्मेन्स करने की बारी आयी। सिंधु अपने यौवन का जलवा लेकर स्टेज पर उतरी तो ताली की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठा, गाने की शुरूआत पुरानी फिल्म सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् के एक गाने से हुयी, उस गाने की घुन पर सिंधु मुझे रिझाने के लिये काफी प्रयास करती है, फिर वो मुझसे लिपट जाती है। उसके इस तरह चिपकने से मेरे अन्दर एक झुरझुरी सी उत्पन्न होती है, मैं काफी संकोच में आ जाता हूं.

तभी ऑडियन्स से आवाजें आती है, इतनी खूबसूरत पत्नी से नाराज नहीं होते है, उनको लग रहा था कि मैं उससे नाराज हूं और इसलिये मैं उसको अपनी बांहों में नहीं ले रहा हूं जबकि यह मेरा संकोच था कि कैसे उसे मैं अपनी बांहों के घेरे में लूं।

इधर उसके चिपकने से उसके जिस्म की गर्मी भी मुझे आह्लादित कर रही थी. तभी वो घूमी और उसकी पीठ मेरे सीने की तरफ हो गयी, उसने मेरे हाथ को पकड़ा और खुद ही मेरी बांहों के घेरे में आ गयी। अभी भी मेरे हाथ को सिंधु पकड़े हुयी थी और मेरा हाथ उसके स्तन को टच कर रहा था। इधर मेरा लंड में भी हल्का सा तनाव आ गया था, जिसकी वजह से मेरा लंड उसले चूतड़ को टच कर रहा था।
शायद इस चीज का अहसास सिंधु को भी हो गया था इसलिये वो अपने चूतड़ को बार बार हिलाकर उसका स्थान बदल रही थी। या फिर मेरे लंड का सुखद अहसास कर रही थी। मर्यादा तो होनी ही थी, काफी लोग बैठे थे इसलिये मैंने अपने हाथ को नीचे उसके पेट पर रख लिया।

पाँच मिनट के इस परफॉर्मेन्स में आखिरकार सिंधु ने मुझे पिघला दिया। परफॉर्मेन्स खत्म होने के बाद भी जब मैं बैठकर बाकी सभी का परफॉर्मेन्स देख रहा था तो भी अब मेरे ख्याल में केवल और केवल सिंधु ही थी, मेरा मन नहीं लग रहा था।

खाना वगैरह खाकर हम दोनों रात को करीब 12 बजे कमरे में घुसे। जिस्म थका हुआ था लेकिन मन मेरा अभी भी सिंधु की तरफ लगा हुआ था जबकि सिंधु खूब बाते किये जा रही थी, काफी खुश लग रही थी।
मैं वही कपड़े पहने हुए सोफे पर लेट गया और उसकी बातो को हाँ हूं में जवाब देने लगा। तभी उसने मेरे माथे पर अपना हाथ रखा और बोली- भईया आप काफी थक गये हो, जाइये लेट जाइये। अभी तक उसने भी कपड़े नहीं बदले थे और उसके पल्लू के झरोखो से उसके मम्में लटकते हुए दिख रहे थे.

तभी मेरी नजर उसके छाती पर पड़ी, जहाँ पर उसके तने हुए निप्पल उसकी साड़ी से दिखाई पड़ रहे थे।
मैंने उसके हाथ को हटाते हुए कहा- तुम सो जाओ, मैं यहीं सो जाऊँगा।
वो बोली- नहीं भईया, बेड बहुत बड़ा है, उस किनारे आप लेट जाओ और मैं इस किनारे लेट जाऊंगी। सुबह से आप इस सिंगल सोफे पर लेटे हुए हो, आपकी पीठ दर्द कर रही होगी।
“ठीक है, लाईट बुझा दो!” कहकर मैं बेड के दूसरे किनारे पर दूसरी तरफ करवट बदल कर लेट गया.

अब तक लाईट भी बुझ चुकी थी। मुझे कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला। करीब एक-दो घंटे की नींद के बाद अचानक मुझे लगा कि कोई मेरे जिस्म से चिपका है, मेरी नींद खुली तो देखा कि सिंधु मुझसे चिपकी हुयी है; मेरे कपड़े क्षत-विक्षत से हैं; मैंने जो धोती पहनी थी, वो लगभग खुल चुकी थी, खुल क्या चुकी थी मेरे जिस्म से अलग होकर बेड के दूसरे किनारे पड़ी हुयी थी। मतलब मैं नीचे से पूर्णरूप से नंगा था और मेरे नागराज बाहर की तरफ अकड़े हुए थे।

यही हाल उसके कुर्ते का था; उसका कुर्ता काफी ऊपर उठ चुका था जिससे उसके दूध जैसा अधखुला जिस्म उस अंधेरे कमरे में भी साफ दिखाई दे रहा था। सिंधु मुझसे कसकर चिपकी हुयी थी कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था।

मैंने उसका हाथ अपने ऊपर से हटाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही मैंने सिंधु का हाथ हटाया, उसने फिर मेरे ऊपर अपना हाथ रख लिया और लगभग उसका आधा जिस्म मेरे ऊपर आ चुका था। मैं क्या करूँ, समझ में नहीं आ रहा था। उसके नथुनों से निकलती हुयी गर्म सांसें मेरे लिए असहनीय हो चुकी थी। थोड़ी देर बाद सिंधु की उंगलियाँ मेरे निप्पल पर चल रही थी। मेरा भी संयम खत्म हो चुका था।

मैंने करवट बदल ली!
पर यह क्या?
सिंधु मुझसे और कस कर लिपट गयी, उसके मम्में मेरी पीठ में धंस रहे थे।

तभी उसका हाथ मेरे मम्मे को दबाने लगा, मेरे निप्पल को कस कस कर नोचने लगा। थोड़ी देर तक वो मेरे निप्पल से खेलती रही, फिर उसका हाथ मेरे चूतड़ को सहलाने लगा। मेरी गांड के अन्दर उंगली डालने की कोशिश कर रही थी।

फिर थोड़ी देर तक के लिये उसका हाथ पैर मेरे ऊपर से हट गया, इसी बीच मैंने जल्दी से करवट बदली तो देखा, सिंधु अपनी सलवार को अपने से अलग कर चुकी है।
और फिर मुझसे चिपक गयी। इस बार मेरे हाथ उसके चूतड़ को सहलाने लगे।

तभी सिंधु बोली- भईया, बर्दाश्त नहीं हो रहा है।
“मुझे भी नहीं हो रहा है।” कहकर मैंने उसको कस कर दबोच लिया और उसके चूतड़ों को कस-कस कर भींचने लगा।

सिंधु फिर बोली- भईया थोड़ा रूकिये!
मेरे हाथ रूक गये, वो उठी और अपने कुर्ते को निकाल कर एक किनारे फेंक दिया साथ ही मेरी जैकेट को भी उतार दिया।

कमरे में एक अजीब सा तूफान था, उसने अपने बालों को खोल लिया था। मेरे हाथ बरबस ही उसके बूब्स को अपनी मुट्ठी में कैद कर चुके थे और जोर-जोर से मसल रहे थे। फिर मेरे दोनों हाथ उसके पीठ और पेट को सहलाते हुए नीचे की तरफ बढ़ रहे थे, अब मेरे हाथ उसकी जांघों की गहराइयों के बीच थे और दोनों अंगूठे उसकी चूत की फांकों को रगड़ रहे थे। जब हम दोनों के बीच ये खेल चल रहा था तो मैं हिचकते हुए बोला- सिंधु, मैं चाहता हूं कि तुम मेरे जिस्म के साथ खेलो, जैसे चाहो वैसे खेलो, मुझे तुम चोदो।

मेरे इतना बोलते ही सिंधु नीचे खिसककर मेरी कमर पर आ गयी और फिर एक हाथ से मेरे निप्पल को दबाने लगी और दूसरे हाथ से मेरे लंड को अपनी गांड से सटाकर उसके मसलने लगी। मेरे ऊपर झुकते हुए वो मेरे होंठों को अपने होंठों का अहसास कराने लगी। कई बार उसने हल्के हल्के किस मेरे होंठों पर किये, फिर अपनी जीभ मेरे होंठों पर चलाने लगी. मैंने उसकी जीभ को पकड़ने के लिये मुंह खोला तो उसने झट से मेरे मुंह को बन्द कर दिया और अपने सिर को हिलाकर मुझे मुंह न खोलने की हिदायत दी।
उसके थूक से मेरे होंठ गीले हो चुके थे।

फिर वो नीचे के तरफ उतरते हुए मेरे सीने पर लगे दो काले काले काली मिर्च रूपी निप्पल को चूसने लगी, कभी वो मेरे निप्पल को चूसती तो कभी दांटों से काटती, मेरे अन्दर तूफान बढ़ता ही जा रहा था। मुझे हल्की मीठी खुजली मेरे लंड पर महसूस होने लगी, मेरा लंड जल्दी से सिंधु के चूत के अन्दर प्रवेश करना चाहता था।
लेकिन मेरे या लंड के चाहने या न चाहने से क्या होता है क्योंकि मैंने सिंधु को पहले ही सब कह रखा था और मैं उसके खेल के बीच में नहीं आना चाहता था।
हालाँकि वो साथ ही मेरे लंड को भी सहला रही थी।

मेरी सेक्स कहानी जारी रहेगी.
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कहानी का अगला भाग: इत्तेफाक से जेठ बहू के तन का मिलन-3

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