भाभी ने चूत दिखा कर बहनचोद बनाया-1

(Bhabhi ne Choot dikha kar Bahanchod Banaya-1)

अन्तर्वासना के सभी पाठकों को मेरा प्यार भरा नमस्कार।

मेरा नाम पार्थ है पर घर में मुझे सब दीपू कहते हैं।
मैं 29 साल का एक बहुत ही आकर्षक लड़का हूँ।

मेरी यह कहानी करीब 9 साल पहले की है, तब मैं पढ़ता था।

यह मेरी पहली और सच्ची कहानी है जो मैं आप लोगों से बताने जा रहा हूँ।

मैं अपने परिवार के बारे में बता दूँ, जिसमें उस वक्त छह सदस्य थे। हम 3 भाई, एक बहन, एक भाभी और मम्मी।

जब मैं छह साल का था पापा का देहांत तभी हो गया था। भाइयों में मैं सबसे छोटा था और बहन मुझसे 2 साल छोटी थी।

बड़े भाई की शादी हो चुकी थी, नई-नई भाभी घर में आई थीं, सब मज़े से चल रहा था।

मैं और मेरी बहन रूपा काफ़ी खुश थे क्योंकि भाभी हम दोनों को बहुत प्यार करती थीं।
हम सब खूब मस्ती करते थे।

गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थीं।

एक दिन मैं अकेला ही भाभी के कमरे में भाभी के साथ लूडो खेल रहा था।

रूपा माँ के साथ बाजार गई थी, हम दोनों घर पर अकेले थे।

अचानक भाभी ने हँसी-मजाक में मुझे पीछे की ओर हल्का सा धक्का दे दिया।

मैं सम्भल नहीं पाया और पीठ के बल उनके पलंग पर लेट गया।

क्योंकि हम उनके ही पलंग पर खेल रहे थे.. मुझे गुस्सा आ गया… मैं उठा और उन्हें पीछे की ओर धक्का देने लगा।

भाभी मुझसे ज़्यादा मज़बूत थीं.. मैं उन्हें नहीं गिरा पा रहा था।

भाभी को गिराने की कोशिश में मेरे दोनों हाथ उनके कंधे से फिसल कर उनकी चूचियों पर आ गए थे।

धक्का देने के लिए मैं उन्हें उसी अवस्था में धकेल रहा था.. जिससे उनकी चूचियाँ दब रही थीं।

मेरे कंधे को दोनों हाथों से पकड़ कर भाभी ने मुझे पीछे धकेल दिया।

मैं फिर गिर पड़ा लेकिन मैं भी हार नहीं मानने वाला था.. मैं उठा और इस बार मैंने भाभी को बाँहों में भर लिया और उन्हें गिराने की कोशिश करने लगा।

इस बार मैं कामयाब भी हो गया।

वो पीठ के बल पलंग पर गिर गईं।

भाभी के दोनों हाथ व मेरी बाँहों में क़ैद थे। वो छटपटाने लगीं..
मैं भाभी के ऊपर लेटा हुआ था, तभी मैंने अपने पैरों से भाभी के पैरों को पकड़ लिया।

अब उनके दोनों पैर भी मेरे पैरों के बीच क़ैद हो गए थे। उनकी चूचियाँ मेरे सीने से दबी हुई थीं… वो अब भी ताक़त लगा रही थीं।

मैंने उन्हें कस कर पकड़े हुआ था, तभी भाभी ने अपने दोनों हाथों को मेरी पकड़ से आज़ाद कर लिया।

अब उनके हाथ मेरे कन्धे के ऊपर से होते हुए मेरे पीठ पर थे और वो भी अब मेरे सिर को पीछे से पकड़ कर अपनी चूचियों पर दबाने लगीं।

मेरा चेहरा उनकी दोनों चूचियों के बीच में दब रहा था।

मुझे लगा जैसे मेरा दम घुट जाएगा.. इस बार मैं उनकी पकड़ से छूटने के लिए छटपटाने लगा..

जब नहीं छूट पाया तो मैं चिल्लाने लगा।

इससे घबरा कर भाभी ने मुझे छोड़ दिया।

मैं उठ कर खड़ा हो गया और लंबी-लंबी सांस लेने लगा।

भाभी मुझे देख कर मुस्कुरा रही थीं.. जबकि मुझे गुस्सा आ रहा था।
मैं गुस्से से उन्हें घूर रहा था और वो मुस्कुराते हुए उठ कर बाथरूम में घुस गईं।

दोपहर का वक्त था.. बाहर तेज़ धूप थी।
मैं जाकर टीवी देखने लगा।

कुछ देर में ही माँ और रूपा भी बाजार से आ गईं।
फिर सबने मिल कर खाना खाया।

माँ खाना खाकर अपने कमरे में आराम करने के लिए चली गईं।
मैं भी अपने कमरे में जाकर आराम करने लगा।

तभी रूपा आ गई और कहने लगी- भाभी ने तुझे बुलाया है।

मैं रूपा के साथ भाभी के कमरे में पहुँचा तो देखा कि भाभी सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट पहने पलंग पर लेटी थीं।
हालांकि यह कोई नई बात नहीं थी कि भाभी मेरे सामने इस रूप में थीं।

कभी-कभी तो वो मेरे सामने कपड़े भी बदल लेती थीं.. क्योंकि मुझे उस वक्त सेक्स का कोई ज्ञान नहीं था।
मुझे नहीं पता था कि औरत और मर्द आपस में मिल कर क्या-क्या करते हैं।
मेरे लिए ये सामान्य बात थी.. मुझे देखते ही वो उठ कर बैठ गईं।

मैंने उनसे पूछा- क्या बात है?

तो उन्होंने कहा- चलो तीनों लूडो खेलते हैं।
मैं तैयार हो गया और हम तीनों लूडो खेलने लगे।

कुछ ही देर में मुझे नींद आने लगी तो मैंने कहा- मैं अब नहीं खेलूँगा.. मुझे नींद आ रही है.. मैं सोने जा रहा हूँ।

तो भाभी ने कहा- यहीं सो जाओ।

मैं वहीं पलंग पर एक किनारे सो गया और वो दोनों लूडो खेलने लगीं।

कुछ देर में मेरी नींद खुलने लगी थी, क्योंकि मुझे अपने लण्ड पर नर्म सा कुछ महसूस हो रहा था।

मैं नींद में ही अपने हाथ को अपने लण्ड पर ले गया तो मैं चौंक गया क्योंकि मेरे लण्ड पर दो हाथ फिसल रहे थे।

मैं आँखें बंद किए लेटे रहा.. मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था।

मेरा लण्ड कड़ा होने लगा था और मेरे पूरे जिस्म में सिहरन हो रही थी। आख़िर मुझसे सहा नहीं गया और मैं उठ कर बैठ गया, तो मैंने देखा कि भाभी और रूपा दोनों ही नंगी पलंग पर बैठी हैं और एक-दूसरे की चूत को सहला रही थीं…

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साथ ही मेरे लण्ड को भी सहला रही थीं। मेरे उठ जाने से रूपा घबरा कर बिना कपड़े पहने ही भाग कर बाथरूम में घुस गई।

मैं भाभी की तरफ देख कर बोला- आप लोग नंगे क्यों हो और मेरे लण्ड को क्यों सहला रही थीं?

तो वो मुस्कुरा कर बोलीं- हम लोग एक नया खेल.. खेल रहे थे।

मैंने कहा- यह कौन सा खेल है.. जो नंगे होकर खेलते हैं?

भाभी बोलीं- यह खेल नंगा ही खेला जाता है… तभी इस खेल में मज़ा आता है.. क्या तुम्हें मज़ा नहीं आ रहा था?

इस पर मैं बोला- मज़ा तो आ रहा था.. पर मैंने तो कपड़े पहने हुए थे।

भाभी बोलीं- कपड़े उतार कर खेलोगे तो और मज़ा आएगा.. खेलोगे?

मैं और मज़ा लेना चाहता था क्योंकि ये मज़ा मेरे लिए एकदम नया था।

फिर भी मैं भाभी से बोला- पर रूपा मेरी बहन है.. मैं उसके सामने कैसे नंगा हो सकता हूँ?

इस पर भाभी मुझे समझाते हुए बोलीं- अरे पगले.. अपनों के सामने नंगा होने में कैसी शर्म.. कोई बाहर वाला थोड़े ही देख रहा है.. हम तीनों तो अपने ही हैं और यहाँ कोई है भी तो नहीं..

यह कहते हुए भाभी मेरे कपड़े उतारने लगीं और मुझे भी पूरा नंगा कर दिया।
उन्होंने मेरे लटके लण्ड को हाथों से पकड़ लिया और मसलने लगीं।

मुझ पर अजीब सा नशा छाने लगा था। मेरा लण्ड फिर से कड़ा होने लगा था और लंबा भी होने लगा था।

मस्ती से मेरी आँखें बंद हो गईं।
तभी मुझे अपने लण्ड पर कुछ गीला-गीला सा महसूस हुआ.. तो मेरी आँखें खुल गईं।

मैंने देखा भाभी मेरे लण्ड को अपने मुँह में डाल कर चूसने लगी थीं।

मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरा लण्ड किसी गर्म हवा भरे गुब्बारे में घुसा हुआ हो।

मैं भाभी के पूरे नंगे जिस्म को गौर से देख रहा था।
पूरा मस्त जिस्म.. उनकी गोल-गोल गोरी सी मचलती चूचियाँ..

आगे क्या हुआ?
यह जानने के लिए अगले भाग को जरूर पढ़िए।
आपको मेरी इस सत्य घटना से कैसा लगा.. मुझे अपने विचारों से अवगत कराने के मुझे ईमेल जरूर कीजिएगा।

कहानी अगले भाग में समाप्य।

 

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