अक्तूबर 2015 की लोकप्रिय कहानियाँ

(Best Stories Published In October 2015)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

प्रिय अन्तर्वासना पाठको
अक्तूबर महीने में प्रकाशित कहानियों में से पाठकों की पसंद की पांच कहानियां आपके समक्ष प्रस्तुत हैं…

लण्ड न माने रीत -1

चारों ओर सन्नाटा था.. बगीचे में कुछ आम नीचे गिरे पड़े थे.. मैंने वही उठा लिए और वापस जाने के लिए मुड़ा.. तभी मुझे कुछ दूर से कुछ लड़कियों के हँसने-खिलखिलाने की आवाजें आईं।
मैं चौंक गया.. भला इस तपती दुपहरी में ये कौन लड़कियाँ हैं.. जो ऐसे खिलखिला कर हँस रही हैं?
उत्सुकता वश मैं आवाज की दिशा में चल दिया.. कुछ ही दूरी पर घने पेड़ों का झुरमुट था और हँसने की आवाजें वहीं से आ रही थीं।

निकट जाकर देखा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई.. और आगे जाकर देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं.. मेरे सामने घनी झाड़ियों के झुरमुट में सात-आठ लड़कियाँ बिल्कुल नंगी.. गोल घेरे में बैठी थीं। सभी लड़कियों ने अपने पैर सामने की तरफ मोड़ रखे थे.. जिससे उनकी चूतें खुलकर दिखाई दे रही थीं।

मैं दबे पांव आगे बढ़ा और एक झाड़ी की ओट से देखने लगा.. उफ़.. क्या नज़ारा था.. मेरे ठीक सामने.. तीन लड़कियाँ बिल्कुल नंगी.. अपनी खुली हुई चूतों को सहला रही थीं। उनमें से दो को मैंने पहचान लिया.. मेरे ठीक सामने मेरे अजीज दोस्त राजा की बेटी आरती बैठी थी। उसके बगल में एक शादीशुदा औरत कुसुम बैठी थी.. जो अपनी चूत में दो उंगलियाँ घुसा कर जल्दी-जल्दी अन्दर-बाहर कर रही थी। उधर आरती भी अपनी चूत की दरार को आहिस्ता आहिस्ता सहला रही थी।

‘ले कुसुम भाभी.. ये घुसा अपनी चूत में.. उंगली से क्या होगा?’

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शादी के बीस दिन बाद

मुझे काम से तीन महीने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा था, वहाँ एक हसीन लड़की से नैन (और बाद में लण्ड चूत भी) लड़ाने का मौका मिला जिसका मैंने अपनी आदत के अनुसार पूरा पूरा लाभ उठाया और वो सुंदरी मेरी रानी बन गई।
वहाँ क्या क्या हुआ था, यग कथा उसका ही वर्णन है।

हुआ यों कि वहाँ हमारी जान पहचान के एक सज्जन श्री शंकर प्रसाद अग्रवाल के बेटे की शादी का रिसेप्शन था जिसमें वहाँ रह रहे उनसे परिचित काफी भारतीयों को बुलाया गया था। पार्टी में बहुत से ऑस्ट्रेलियाई भी थे परन्तु भारतीयों की संख्या अधिक थी। अग्रवाल जी एक बिज़नेस मैन हैं और अच्छे धनवान हैं।
पार्टी शहर के बाहर एक मशहूर रिसोर्ट में रखी गई थी। कॉकटेल्स, स्नैक्स और खाना सभी का हाई क्लास इंतज़ाम था, कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी रखा गया था जो दस बजे से शुरू होना था।
रिसोर्ट में एक बड़ा सा हॉल और उसके साथ लगा हुआ काफी बड़ा लॉन और स्विमिंग पूल में पार्टी थी, बहुत बढ़िया रोशनी की गई थी। सब कुछ अग्रवाल जी की हैसियत के अनुसार ही था।

शाम 8 बजे से लोग पहुँचने शुरू हो गए थे, करीब ढाई सौ मेहमानों का प्रबंध किया गया था। मैं और मेरी पत्नी जूसी रानी साढ़े आठ बजे पहुँच गए। जूसी रानी और महिलाओं के साथ गपशप में लग गई और मैं एक वाइन का गिलास हाथ में लेकर इधर उधर मंडराता हुआ अपने वाकिफ लोगों से हेलो हाय करने लगा।

कुछ देर बाद मैं हॉल से निकल कर बाहर गार्डन में चला गया क्योंकि काफी लोग वहाँ भी पार्टी का मज़ा ले रहे थे।
वहीं मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी जिसको देखते ही लण्ड में एक सुगबुगाहट सी हुई कि हाँ यह सुन्दरी चूत चुदक्कड़ हो सकती है इसलिए इस पर ध्यान देना चाहिए।

थोड़ा नज़दीक जाकर मैंने उसे गौर से निहारा, वो बेहतरीन खूबसूरती की मालकिन थी, पांच फुट छह इंच का क़द, छरहरा बदन और उम्र यही कोई 29 या 30 की… रंग इतना गोरा कि गोरी चमड़ी वाले ऑस्ट्रेलियाई भी फीके लगें।
गहरे काले रंग का पैंट सूट व हाई हील के कीमती जूते पहने वो गज़ब ढा रही थी, गले में एक पतली सी सोने की चेन से लटकता हुआ एक डिज़ाइनर पेंडल, हाथ में एक ड्रिंक का गिलास था, लगता था कि शायद रेड वाइन है, नाक नक्शा अति उत्तम ! बड़ी बड़ी आँखें, सुडौल सुन्दर बाहें और कन्धों तक लहराते हुए घने काले बाल ! मेकअप के नाम पर सिर्फ हल्के से कॉपर शेड की लिपस्टिक ! अकेली खड़ी ये क़यामत सब तरफ बिजलियाँ गिरा रही थी।

मैं तुरंत उसकी ओर लपका। यह तो निश्चित था कि बेपनाह हुस्न का मालिक यह पक्षी ज़्यादा समय तक आज़ाद न उड़ पायेगा। अगर मैंने देर की तो शिकारी बाज़ों से भरी इस में दुनिया कोई न कोई बाज़ इसको ले उड़ेगा।
उसके निकट पहुँच कर मैंने कहा- मैडम गुड ईवनिंग, मेरा नाम राज है!

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गर्भवती पड़ोसन के फ़्लैट में

मुंबई में, सुना था कि सबसे बड़ी समस्या मकान की होती है इसलिए मैंने अपने कई आफिस के लोगों से कह रखा था कि कोई ढंग का सस्ता सुंदर 1 से 3 कमरों का सेट मेरे लिए खोजें।
मैंने अभी हाल में ही गुजरात से ट्रान्सफर होने पर मुंबई ज्वाइन किया था। यहाँ गेस्ट हाउस में रहते हुए 13 दिन हो चुके थे और 1 सप्ताह में इसे खाली भी करना था पर कोई इंतजाम नहीं हो पाया था।

आज छुट्टी के दिन मैं टीवी देख रहा था और मकान के बारे में भी सोच रहा था तब ही फोन कि घंटी बजी।
फोन मेरे किसी दोस्त के दोस्त का था जिसके जानने वालों का मुंबई में मकान था और उन्होंने मुझे फोन करके बात करने के लिए कहा था।
सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा कि कुछ तो आशा की किरण बंधी।
खैर मैंने फौरन फोन पर बात की और पता चला कि मकान मालिक से ही बात हो रही है।

वो दूसरे शहर में रहते थे तो उन्हें अपने मकान के लिए एक ऐसे किराएदार की आवश्यकता थी जो केयरटेकर की तरह उनके मकान की देखभाल भी कर सके, और बिजली आदि बिलों के भुगतान भी करता रहे, बस यही किराए की राशि होगी जो कि लगभग दस हज़ार के आसपास होता है।
इसलिए उन्होंने ऐसा ऑफर दिया था क्योंकि वो कभी कभी ही आते थे।
उन्होंने जाकर देखने को कहा तो मैंने धन्यवाद देते हुए पता नोट किया और कुछ देर बाद आफिस की गाड़ी से वहाँ गया क्योंकि अभी मैं शहर के भूगोल से परिचित भी नहीं था।

उस बिल्डिंग के सेक्रेटरी से फ्लैट की चाबी लेकर मैं ड्राइवर के साथ 29वें फ्लोर पर गया और फ़्लैट का दरवाजा खोल कर अंदर गया। 3 बेडरूम, 3 बालकनी, हाल, किचन और एक सरवेंट क्वार्टर, 4 एसी, फर्निश्ड फ़्लैट और बहुत बड़ी छत – इतने कम पैसों में कहीं से भी बुरा नहीं था सिवाय इसके कि वह टॉप फ्लोर पर अकेला पेंट हाउस जैसा फ़्लैट था।

मेरा आफिस भी 10 मिनट की दूरी पर था, टहलते हुए आना जाना किया जा सकता था।
इस बिल्डिंग में 3 लिफ्ट हर फ़्लैट के बगल से आने-जाने के लिए थीं। हर फ्लोर पर 3 फ़्लैट थे और हर कोने वाले फ़्लैट के ऊपर पेंट-हाउस नुमा ऐसा फ़्लैट था। हर कमरे में वीडियोफोन की व्यवस्था भी थी। मैंने फौरन मकान मालिक को फोन से मकान लेने की हामी भर दी और 2 दिन बाद रविवार को शिफ्ट करने तथा सेक्रेटरी को सूचित करने के लिए कह दिया।

रविवार को नाश्ता करके मैं अपना एक सूटकेस लेकर उस बिल्डिंग में अपने ड्राइवर के साथ पहुँच गया। सिक्योरिटी गार्ड ने चाबी दी क्योंकि सेक्रेटरी साहब किसी काम से बाहर गए हुए थे, वो मेरे साथ फ्लैट तक आया और बताया कि मैं देख लूँ, अगर कुछ काम और भी करवाना हो तो अभी या फोन से बता सकता हूँ।

मैंने ड्राईवर से एक बार फिर से सब चेक करने के लिए कहा और बेडरूम की अलमारी में अपना सूटकेस रख कर सोफ़े पर बैठ गया।तब तक ड्राइवर ने भी ok रिपोर्ट देते हुए घर जाने की इजाजत मांगी।

छुट्टी का दिन था सो मैंने उसे 200/- देते हुए कार भी शाम तक अपने पास रख कर परिवार के साथ घूमने की इजाजत दे दी और वो चला गया।

मैंने चेनेल लाक कर दिया ताकि कोई ऊपर न आ सके और अंदर आकर सारे कपड़े उतार कर नंगा ही घूमने लगा।
मुझे अकेले रहने पर नंगा रहना, सोना अच्छा लगता है।
और मैं फ़्लैट को अच्छी तरह से देखने का बाद लेट कर सो गया।

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मेरठ की अंजलि को बनाया लेस्बियन- 1

इस बार भी रविवार की छुट्टी हुई तो मेरे पति रवि ने मेरठ जाने की बात कही। महीने में एक बार तो उनका मेरठ का चक्कर लग ही जाता था।
मैंने पूछा- मेरठ में ऐसा क्या काम है?
तो उन्होंने जवाब दिया- ललित से कुछ काम है।

ललित से उनकी इलाहाबाद में दोस्ती हुई थी, दोनों एक साथ ही पढ़ते थे, शादी के बाद भी ललित से रवि की दोस्ती बनी रही, उन्हीं से मिलने रवि अक्सर मेरठ जाते रहते थे लेकिन मुझे एक बार भी अपने साथ नहीं ले गये।

इस बार न जाने क्यों मुझे कुछ शक हुआ तो रवि के मेरठ पहुँचने के बाद मैंने ललित की बीवी अंजलि को फोन मिलाया।
अंजलि का जवाब तो चौंकाने वाला था, उसका कहना था कि रवि उनके घर नहीं आते बल्कि ललित ही हर महीने में एक बार रवि से मिलने जाते हैं।

मैंने कहा- यही हाल रवि का है, वो भी महीने में एक बार मेरठ जाने की बात कह कर जाते हैं।
मैं समझ गई कि कुछ तो गड़बड़ घोटाला है लेकिन अंजलि को अपने पति पर पूरा भरोसा था, उसका पति ललित पूजा पाठ का शौकीन था। कुछ गलत करने की तो वो सोच भी नहीं सकता था।

इतने सालों बाद भी मेरी अंजलि से मुलाकात नहीं हुई थी। वो गांव में पल-बढ़ कर मेरठ शहर में आई थी, उसके संस्कार तो अभी भी गांव वाले ही थे, साड़ी, सूट से आगे कुछ नहीं।

पिछली बार जब ललित अकेले मेरे घर आये थे तो मैं मिनी स्कर्ट और मिनी टॉप में थी, मुझे देखकर ललित कहने लगे कि अंजलि को भी थोड़ा माडर्न बना दो।

अब समस्या यह थी कि दोनों दोस्त अपनी अपनी बीवियों से झूठ बोलकर घर से निकलते हैं तो करते क्या हैं।
यह जानने के लिये मैंने रवि को फोन किया और साफ बता दिया कि मेरी अंजलि से बात हो गई है इसलिये मुझे सच सच बता दो कि दोनों कहाँ हो और क्या करते हो।
रवि भी समझ गये कि उनकी चोरी पकड़ी गई है इसलिये बोले कि घर आकर सब बता दूँगा।
मैं समझ गई कि दाल में कुछ काला है।

मेरठ से लौट कर रवि ने बताया कि सीधा साधा दिखने वाला ललित दरअसल गांड मरवाने को शौकीन है।
यह सुनकर मुझे काफी हैरानी हुई, मैंने रवि से कहा- मुझे पूरी बात बताओ।

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चोर से चूत चुदवाई

यह कहानी है इलाहाबाद के रहने वाली एक बहुत ही संभ्रांत घर की महिला जिसका नाम है सरोजिनी।
अब इलाहबाद में सरोजिनी को ढूंढने मत निकाल पड़ना क्योंकि सरोजिनी की पहचान छुपाने के लिए शहर का नाम बदल दिया गया है। बाकी कहानी में आने वाले सभी पात्रों के नाम असली हैं और सभी घटनाएँ बिल्कुल सच्ची हैं।

मैं, सरोजिनी, उम्र करीब 53 वर्ष, इलाहाबाद के एक अमीर और रसूखदार घर की मालकिन हूँ। पति के बहुत से कारोबार हैं, दोनों बेटे और मेरे पति मिल कर कारोबार संभालते हैं।
मगर जितना बड़ा कारोबार होता है, उतनी ही परेशानियाँ भी होती हैं।
इन्हीं परेशानियों की वजह से मेरे पति को हाई शूगर हो गई, शूगर का सबसे ज़्यादा असर उनकी आँखों, स्किन और सेक्स पावर पर हुआ। जो आदमी मुझे आधा पौना घंटा रगड़ता था वो इंसान अब इस हालत में था कि मैं जो मर्ज़ी कर लूँ मगर उसके अंग में कोई करार नहीं आता था, ज़िंदा मुर्दा एक समान था।

अब आप सोचेंगे के एक औरत होकर मेरी भाषा ऐसे कैसी हो गई?
तो सुनो, आज की बात नहीं है, करीब 3 साल पहले मैं अपनी किट्टी पार्टी में गई थी, वहाँ पर मेरी एक सहेली जो अपने पति की शुगर की प्रॉबलम के वजह से मेरी तरह ही काम अगन में जल रही थी, उसने मुझे बताया कि अगर ज़्यादा आग लगे तो अन्तर्वासना डॉट कॉम पर सेक्सी कहानियाँ पढ़ लिया कर और अपने हाथ से ही अपनी वासना को शांत कर लिया कर!

अब पिछले तीन साल से मैं यही कर रही हूँ। जब घर पे कोई नहीं होता तो अपने लैपटाप पे अन्तर्वासना डॉट कॉम खोली, कोई अच्छी सी कहानी पढ़ी और कोई भी चीज़ जो मुझे ठीक ठाक लगी, अपने अंदर डाली और अपनी आग बुझा ली। किसी को पता भी नहीं चला, काम क्षुधा भी शांत हो गई, और बाहर मुँह मारने की भी ज़रूरत नहीं!
और जब पति को बताया तो उन्होंने भी बुरा नहीं माना, बल्कि मुझे एक प्लास्टिक का लंड ला कर दे दिया।

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