मई 2016 की लोकप्रिय कहानियाँ

(Best Stories Published In May 2016)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

प्रिय अन्तर्वासना पाठको
मई महीने में प्रकाशित कहानियों में से पाठकों की पसंद की पांच कहानियां आपके समक्ष प्रस्तुत हैं…

कॉलेज की हंसमुख और सुन्दर सहपाठिनी संग प्रेम प्रसंग

 

यह कहानी मेरे इंजीनियरिंग महाविद्यालय की सहपाठिनी सिद्धि के साथ दोस्ती की है। सिंद्धि सूरत के पास नवसारी में रहने वाले सम्पन्न परिवार की गुजराती लड़की थी, वह दिखने में सुन्दर, गोरी थी, बहुत ही हसमुख, जिंदादिल लड़की थी।

कक्षा में हमारी बातचीत पहले सेमेस्टर से थी, हम अच्छे दोस्त बन गए थे, वह सभी विषयों (सेक्स भी) पर मुझसे बात करती। महाविद्यालय में उसका कोई बॉयफ्रेंड नहीं था, हम एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे, पर प्यार जैसा कुछ ना था।

बात रक्षा बंधन के समय की है, बी.इ. का पांचवा सेमेस्टर था, पड़ोस में पहचान के एक भैया को सूरत में नौकरी मिली थी, उनको कुछ सामान ले कर वहाँ जाना था, साथ में उन्होंने मुझे उसी हफ्ते शनिवार को चलने को कहा।

हम ट्रेन से रविवार सुबह सूरत पहुंचे, स्टेशन से ‘पार्ले पॉइंट’ के पास ऑफिस फ्लैट गए, वहाँ पर सब कुछ जमाने के बाद मैंने सिद्धि को फ़ोन लगाया।
वो अचंभित थी कि मैं सूरत में था। हालचाल जानने के बाद मैंने उसको मिलने के लिए सूरत आने को कहा। उसने बताया कि अगले दिन सोमवार को 10-11 के बीच वो स्टेशन पहुंचेगी।

मैंने भैया को सिद्धि के आने का बता दिया था। उनको कोई परेशानी नहीं थी, वैसे भी फ्लैट वो शाम के 6 बजे के बाद ही आने वाले थे।

सोमवार को भैया के ऑफिस निकलने के बाद मैं ऑटो पकड़ स्टेशन आ गया।
दस बजे थे, सिद्धि के आने में बीस मिनट थे, तब तक मैं पैदल ही सूरत स्टेशन के आस पास चक्कर लगाने लगा।

ट्रेन आते ही उसने मुझे फ़ोन किया, हम औपचारिक तरीके से ही मिले, हाथ मिलाते हुए मैंने कहा- माफ़ करना, तुम्हें तकलीफ दी यहाँ बुलाने की।

उसने जवाब दिया- तुमने अचंभित कर दिया यहाँ आकर… और माफ़ी क्यों? मैं तुम्हारे उधर आऊँ, तो क्या मेहमान नवाजी नहीं करोगे?
मैंने कहा- बिल्कुल करूँगा, फ़िलहाल, फ्लैट या कहीं घूमने जाने से पहले, चलो कुछ खाया जाये, नाश्ता नहीं किया।

सिद्धि ने पूछा- कहाँ ले जाओगे?
मैंने जवाब दिया- यहाँ का कुछ नहीं जनता, बस फ्लैट के पास एक रेस्टोरेंट देखा है।

ऑटो कर हम वापस पार्ले पॉइंट आ गए, वहाँ कॉफ़ी कल्चर रेस्टोरेंट में कुछ खाने और कॉफ़ी का आर्डर देने के बाद मैंने सिद्धि से कहा- मुझे सूरत घूमने का कुछ खास मन नहीं है, मैंने तुम्हें यहाँ बुलाया ताकि तुम्हारे साथ कुछ समय बिता सकूँ।
सिद्धि ने पूछा- क्यों भई, क्या इरादा है? और कैसे समय बिताना चाहते हो?
हमारी नज़रें मिली, और वो मुस्कुराने लगी।

मैंने आँख मारते हुए कहा- बस तुम्हारे होठों की लाली चुरानी है।

पूरी कहानी यहाँ पढ़िए…
 

वो सात दिन फूफाजी के साथ

 

मेरा नाम तारा है.. मेरी उम्र 43 साल है.. और मैं तीन बच्चों की माँ हूँ। मेरे पति रेलवे में काम करते हैं, उनकी उम्र 49 साल है। वो पिछले 3 साल से ओड़िसा में हैं।

मैं अपने जीवन काल में अब तक 4 लोगों के साथ सम्भोग कर चुकी हूँ। शादी के 3 साल के बाद ही मेरे और मेरे पति के बीच रतिक्रिया में बहुत बदलाव आ गया था। मैं उन दिनों जवान तो थी ही और मेरी कामेक्षा भी अधिक हो गई थी.. क्योंकि एक बार सम्भोग का स्वाद चख लेने के बाद चूत की चुदने की चाहत बढ़ जाती है।
मेरी हालत भी ऐसी ही हो गई।

पति की अरुचि के कारण मैंने हस्तमैथुन की आदत लगा ली। फ़िर जब मुझे मौका मिला तो मैंने दूसरों से सम्भोग कर लिया।

बात 5 साल पहले की है। मेरे पति के फूफ़ा जी की बीवी यानि बुआ जी की तबियत बहुत खराब थी और उनके घर कोई नहीं था.. तो मेरे पति ने मुझे उनके घर जाने को कहा।
मैं अपने छोटे बच्चे के साथ वहाँ चली गई, उस वक्त मेरा बेटा 15 महीने का था।

मैं बुआ जी की देखभाल में लग गई। घर में बस हम 4 लोग ही थे, मैं.. मेरा बेटा और वो दोनों।

एक दिन सुबह बुआ जी की तबियत ज्यादा ही खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। उनकी बच्चेदानी में घाव हो जाने से इन्फेक्शन बढ़ गया था।
दिन में तो मैं उनके साथ रहती.. पर शाम को वापस घर आ जाती, फूफाजी के साथ ही शाम का खाना खाते और फ़िर बातें करते और फ़िर अपने-अपने कमरे में सोने चले जाते।

एक रात मैं जब पेशाब करने बाहर गई तो मैंने फूफाजी के कमरे के दरवाजा खुला देखा और उसमें से रोशनी आती देखी।
मैंने सोचा कि शायद फूफाजी को कोई परेशानी होगी.. इसलिए अन्दर उनसे पूछने चली गई।

जब मैंने अन्दर देखा.. तो मेरे होश ही उड़ गए।
मैंने देखा कि वे अपनी आँखें बन्द किए अपने लिंग को जोर-जोर से हिला रहे हैं।

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