प्रेम गुरु

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तीसरी कसम-9

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना मैं जैसे ही बेड पर बैठा पलक फिर से मेरी गोद में आकर बैठ गई और फिर उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया। “जीजू, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?” “नहीं मेरी खूबसूरत परी… मैं तुम्हें कैसे भूल […]

तीसरी कसम-8

On 2012-02-20 Category: चुदाई की कहानी Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना रेशम की तरह कोमल और मक्खन की तरह चिकना अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस हो रहा था। जैसे ही मेरी अंगुली का पोर उस रतिद्वार के अन्दर जाता उसकी पिक्की संकोचन करती और उसकी कुंवारी पिक्की का कसाव मेरी अंगुली पर महसूस होता। पलक जोर जोर से सीत्कार करने लगी […]

तीसरी कसम-7

On 2012-02-19 Category: चुदाई की कहानी Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना “जिज्जू ! एक बात सच बोलूँ ?” “क्या?” “हूँ तमारी साथै आपना प्रेम नि अलग दुनिया वसावा चाहू छु। ज्या आपने एक बीजा नि बाहों माँ घेरी ने पूरी ज़िन्दगी वितावी दयिये। तमे मने आपनी बाहो माँ लाई तमारा प्रेम नि वर्षा करता मारा तन मन ने एटलू भरी दो […]

तीसरी कसम-6

On 2012-02-18 Category: चुदाई की कहानी Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना “पलक अगर कहो तो आज तुम्हें पहले वो … वो …?” मेरा तो जैसे गला ही सूखने लगा था। “सर, ये वो.. वो.. क्या होता है ?” मेरी हालत को देख कर मुस्कुरा रही थी। “म … मेरा मतलब है कि तुम्हें वो बूब्स को चुसवाना भी तो सिखाना था […]

तीसरी कसम-5

On 2012-02-17 Category: जवान लड़की Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना ‘बस सर, अब वो वो… जल थेरपी… सिखा दो?’ उसकी आवाज थरथरा रही थी। ‘ह… हाँ… ठीक है… च… चलो बाथ रूम में चलते हैं’ मुझे लगा मेरा भी गला सूख गया है। मैं तो अपने प्यासे होंठों पर अपनी जबान ही फेरता रह गया। उसने नीचे झुक कर फर्श […]

तीसरी कसम-4

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना मैं अभी अपने ख्यालों में खोया ही था कि पलक की आवाज से चौंका। ‘सर एक बात पूछूँ?’ ‘यस… हाँ जरूर !’ ‘क्या एक आदमी दो शादियाँ नहीं कर सकता?’ ‘क्यों? मेरा मतलब है तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?’ ‘कुछ नहीं ऐसे ही !’ ‘दरअसल मुस्लिम धर्म में चार […]

तीसरी कसम-3

On 2012-02-15 Category: जवान लड़की Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना ‘पलक…’ ‘हुं…’ ‘पर तुम्हें एक वचन देना होगा !’ ‘ केवू वचन?’ (कैसा वचन?) ‘बस तुम शर्माना छोड़ देना और जैसा मैं समझाऊँ, वैसे करती रहना !’ ‘ऐ बधू तो ठीक छे पण तमे केवू आवशो? अने आवया पेला मने कही देजो.. भूली नहीं जाता? कई गाड़ी थी, केवू, केटला […]

तीसरी कसम-2

On 2012-02-14 Category: कोई मिल गया Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना हे लिंग महादेव ! अगर मुझे इन छोटे छोटे चीकुओं को चूसने या मसलने का एक मौका मिल जाए तो मैं तो सब कुछ छोड़छाड़ कर इनका अमृतपान ही करता रहूँ। एक बार तो मेरे मन में आया कि उसे कह दूँ कि मेरे पास आकर रोज़ इनकी मालिश करवा […]

तीसरी कसम-1

On 2012-02-13 Category: कोई मिल गया Tags:

प्रेम गुरु की अनन्तिम रचना हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है बाद मुद्दत के होता है चमन में दीदा-ए-वार पैदा ओह… प्रेम ! क्या तुम नहीं जानते प्रेम अँधा होता है। यह उम्र की सीमा और दूसरे बंधन स्वीकार नहीं करता। इवा ब्राउन और अडोल्फ़ हिटलर, राहब (10) और जेम्स प्रथम, बित्रिश (12) […]

माया मेम साब-5

वह पेट के बल लेट गई और उसने अपने नितम्ब फिर से ऊपर उठा दिए। मैंने स्टूल पर पड़ी पड़ी क्रीम की डब्बी उठाई और ढेर सारी क्रीम उसकी गाण्ड के छेद पर लगा दी।

माया मेम साब-4

उसने मेरे लण्ड का टोपा अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी। क्या कमाल का लण्ड चूसती है साली पूरी लण्डखोर लगती है? उसके मुँह की लज्जत तो उसकी चूत से भी ज्यादा मजेदार थी।

माया मेम साब-3

मैंने उसकी नाइटी को ऊपर करते हुए अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच डाल कर उसकी चूत की दरार में अपनी अंगुली फिराई और फिर उसके रस भरे छेद में डाल दी।

माया मेम साब-2

'ओह... माया, सच में तुम्हारे होंठ और उरोज बहुत खूबसूरत हैं... पता नहीं किसके नसीब में इनका रस चूसना लिखा है।' 'जीजू तुम फिर...? मैं जाती हूँ!'

माया मेम साब-1

माया ने जीन का निक्कर पहन रखा था जिसमें उसकी गोरी गोरी पुष्ट जांघें तो इतनी चिकनी लग रही थी जैसे संग-ए-मरमर की बनी हों। मेरा अंदाज़ा था कि उसने अन्दर पेंटी नहीं डाली होगी।

मधुर प्रेम मिलन-5

सच कहूँ तो मैंने कभी किसी का लिंग अपने मुँह में लेना और चूसना तो दूर की बात है कभी ठीक से देखा भी नहीं था। पर सहेलियों से सुना बहुत था कि लिंग ऐसा होता है वैसा होता है।

मधुर प्रेम मिलन-4

भंवरे ने डंक मार दिया था और शिकारी अपना लक्ष्य भेदन कर चुका था। अब कलि खिल चुकी थी और भंवरे को अपनी पंखुड़ियों में कैद किये अपना यौवन मधु पिलाने को आतुर हो रही थी।

मधुर प्रेम मिलन-3

उन्होंने अपने मुन्ने को मेरी मुनिया (लाडो) के चीरे पर रख दिया। मैंने अपनी साँसें रोक ली और अपने दांत कस कर भींच लिए। मेरी लाडो तो कब से उनके स्वागत के लिए आतुर होकर प्रेम के आंसू बहाने लगी थी।

मधुर प्रेम मिलन-2

प्रेषिका : स्लिमसीमा ‘मधुर, क्या मैं एक बार आपके हाथों को चूम सकता हूँ?’ मेरे अधरों पर गर्वीली मुस्कान थिरक उठी। अपने प्रियतम को प्रणय-निवेदन करते देख कर रूप-गर्विता होने का अहसास कितना मादक और रोमांचकारी होता है, मैंने आज जाना था। मैंने मन में सोचा ‘पूरी फूलों की डाली अपनी खुशबू बिखरने के लिए […]

मधुर प्रेम मिलन-1

वो अक्सर बाथरूम में जब नहाने के लिए अपने सारे कपड़े उतार देती है तब उसे तौलिये और साबुन की याद आती है। अभी वो बाथरूम में है और वो तौलिया ले जाना भूल गई है।

हुई चौड़ी चने के खेत में -5

मैं चाह रही थी कि काश वक्त रुक जाए और जगन इसी तरह मुझे चोदता रहे। पर मेरे चाहने से क्या होता आखिर शरीर की भी कुछ सीमा होती है। मैंने अपनी चूत का संकोचन किया

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