मेरी अन्तर्वासना नहीं जाती… मैं क्या करूँ?

अन्तर्वासना कोई पाप नहीं… अगर पाप होती तो तुम न होते, पाप होती तो ऋषि मुनि ज्ञानी न होते! जिससे यह संसार चलता है उसे तुम पाप कहोगे?
अन्तर्वासना का पहला काम है तुम्हें जीवन देना! तुम्हें भी तो इसी से जीवन मिला है…

नाजायज़ औलाद

अन्तर्वासना की एक भिन्न शैली की लेखिका ‘फुलवा’ की यह रचना एक लम्बे अरसे के बाद अन्तर्वासना पर प्रकाशित हो रही है… इस रचना के बारे में कुछ भी लिखना सूर्य को दिया दिखाना है, आप खुद ही जान लीजिये इसे पढ़ कर… इस कहानी में सेक्स नहीं है…

पेट

मजदूरी करते रज्जो थकी नहीं थी क्योंकि यही उसका पेशा था। बस सड़क की सफाई करते ऊब सी गई थी। अब वह किसी बड़े काम की तलाश में थी जहाँ… [Continue Reading]

क्या वो किसी नाम का हकदार नहीं !

शरीर बेचने वाली वेश्या है पर उसके शरीर को खरीदने वाले का क्या नाम है यह मर्दवादी समाज ने अपने बनाए कानून में बताया ही नहीं।

खामोश शर्मिन्दगी

बहुत देर से रेलवे आरक्षण की लम्बी कतार में खड़े रहने के बाद अब मैं खिड़की के काफी क़रीब पहुँच चुका था। उसके आगे तीन लोग थे। गर्मी से मैं… [Continue Reading]

वेश्या तो पूज्या होनी चाहिए

जी नहीं ! मुझे यह कहने में जरा भी शर्म नहीं है कि मैं एक वेश्या यानि सेक्स वर्कर हूँ ! मेरे कई नाम हो सकते हैं- वेश्या, कालगर्ल, एस्कोर्ट,… [Continue Reading]

अगर उस दिन मैं दरवाजा खोल देती

कई बातें ऐसी होती हैं जो बीत जाने के बाद बरसों तक, कई बार तो ताउम्र अपनी याद बनाये रखती हैं। मुझे आज भी बहुत अच्छी तरह याद है कि… [Continue Reading]

मेरा यौवन

फ़ुलवा यौवन तरस गया है अब मेरा, तेरी चाहत में मिट जाने को, तू ना आया मोरे सजना, मैं ताकूँ तेरी रहिया तोरे आने को, पसरी हैं मोरी बहियाँ तोरे… [Continue Reading]

अग्निपरीक्षा

फ़ुलवा ऍम बी ए करके सुरेखा को अच्छी नौकरी मिल गई। छोटे से शहर की रहने वाली सुरेखा सरल स्वभाव की थी, अतः नौकरी के लिए मायानगरी मुम्बई भेजते समय… [Continue Reading]

काफ़ी है राह की इक ठोकर

‘नमस्कार चटर्जी बाबू, क्या चल रहा है?’ कहते कहते घोष बाबू दरवाज़ा खोल कर अन्दर आ गए। चटर्जी बाबू बरामदे में बैठे चाय की चुसकियाँ ले रहे थे। ‘कुछ खास… [Continue Reading]

मेरा फ़र्ज़, उसका फ़र्ज़

बेंगलौर स्थित महात्मा गांधी रोड हर किसी की जुबां पर रहता है। किसी खास कारणवश, यह तो पता नहीं। पर आज एक अजीब घटना घटी। मैं महात्मा गांधी रोड स्थित… [Continue Reading]

मुम्बई की गंध-2

तीन फुट ऊंचे, संगमरमर के फर्श पर, बहुत कम कपड़ों में, चीखते आर्केस्ट्रा के बीच वह लड़की हंस हंस कर नाच रही थी। बीच-बीच में कोई दस-बीस या पचास का… [Continue Reading]

मुम्बई की गंध

“तेल भरवा लें !” कह कर रतन ने अपनी कार जुहू बीच जाने वाली सड़क के किनारे बने पेट्रोल पंप पर रोक दी और दरवाजा खोल कर बाहर उतर गया।… [Continue Reading]

गुलदस्ता

फ़ुलवा बाथरूम से निकलते हुए कुसुम की नजर जब रीतेश के कमरे की ओर गई तो उसने देखा कि दरवाजा आधा खुला था और मिनी अपने को किसी से छुड़ाने… [Continue Reading]

भाभियों का दुःख

सुनिये जी ! कल रात फिर आपसे भूल हो गई है । इतनी जल्दबाजी में क्यूं रहते हैं ? वैधानिक चेतावनी: अविवाहित व्यस्क इस व्यंग्य लेख को माँ-बाप से छिप… [Continue Reading]

फ़ुलवा

उसका पति धीरू दो बरस पहले शहर कमाने चला गया। गौने के चार माह बाद ही चार-छः जनों के साथ वह चला गया। तब से अकेली फ़ुलवा घर गृहस्थी संभाल… [Continue Reading]

चाहत का इन्तज़ार

हमारे गाँव में पवन के पिताजी की करियाने की दुकान थी। वह अपने पिताजी की तरह मोटू व अकड़ू था। मेरे पिताजी नगर की नगरपालिका में क्लर्क थे, रोज छः… [Continue Reading]

मेरे जीजू और देवर ने खेली होली-2

शाम को साढ़े तीन बजे अमित का फ़ोन आया, कहने लगा- भाभी ! तैयार रहना, मैं थोड़ी देर में आ रहा हूँ आपको लेने। मैंने उसे कहा- दीदी और जीजू… [Continue Reading]

मेरे जीजू और देवर ने खेली होली-1

जीजू और देवर संग होली मैं अपने मम्मी-पापा के साथ सोनीपत में रहती हूँ। मेरी एक बड़ी बहन माला जिसकी शादी को अभी आठ महीने ही हुए हैं दिल्ली में… [Continue Reading]