माँ-बेटी को चोदने की इच्छा-26

(Maa Beti Ko Chodne ki Ichcha-26)

यह कहानी निम्न शृंखला का एक भाग है:

अब तक की कहानी में आपने पढ़ा…

मैंने माया के चेहरे की ओर देखा जो कि इस बात से अनजान थी।

उसकी आँखें बंद और चेहरे पर ओस की बूंदों के समान पसीने की बूँदें चमक रही थीं और मुँह से दर्द भरी आवाज लगातार ‘आआअह अह्ह्ह ह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह’ निकाले जा रही थी।

मैं उसकी इस हालत तरस खाते हुए वाशरूम गया और सोख्ता पैड और गुनगुना पानी लाकर उसकी गाण्ड और चूत की सफाई की..
जिससे माया ने मेरे प्यार के आगोश में आकर मुझे अपने दोनों हाथ खोल कर अपनी बाँहों में लेने का इशारा किया।

तो मैं भी अपने आप को उसके हवाले करते हुए उसकी बाँहों में चला गया।

उसने मुझे बहुत ही आत्मीयता के साथ प्यार किया और बोली- तुम मेरा इतना ख़याल रखते हो.. मुझे बहुत अच्छा लगता है.. आज से मेरा सब कुछ तुम्हारा राहुल.. आई लव यू.. आई लव यू.. सो मच.. मुझे बस इसी तरह प्यार देते रहना।

अब आगे..

फिर मैं और माया दोनों एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे।

जब माया का दर्द कुछ कम हुआ तो वो उठी और वाशरूम जाने लगी और पांच मिनट बाद जब वापस आई तो चहकते हुए बोली- ओए राहुल तूने तो शादी की पहली रात याद दिला दी।

तो मैंने भी उत्सुकता से पूछा- वो कैसे?

तो बोली- अरे जब मैंने पति के साथ पहली बार किया था तब भी मुझे बहुत दर्द हुआ था और खून से तो मेरे कपड़े भी खराब हो गए थे.. पर कुंवारी चूत और कुंवारी गांड फड़वाने में थोड़ा अंतर लगा।

तो मैंने भी मुस्कुराते हुए पूछा- क्या?

बोली- उस दिन बहुत खून बहा था जिसके थोड़ी देर बाद में वाशरूम गई तो खून हल्का-हल्का बह रहा था.. पर आज तो सिर्फ हल्का-हल्का ही निकला.. मैं यही देखने गई थी।

तो मैं उसकी बात सुनकर ताली बजा कर हँसने लगा।

वो मुझसे बोली- तुम्हें हँसी क्यों आई?

तो मैंने बोला- सच में.. तुम्हें कुछ मालूम नहीं पड़ा।

वो बोली- क्यों.. क्या हुआ?

तो मैंने उसे उसका गाउन दिखाया जिस पर खून की दो-चार बूँदें टपकी हुई थीं। क्योंकि उसका गाउन नीचे ही पड़ा था और पहले मैंने ही उसे देखा था और एक तरफ कर दिया था।

फिर उसे वो सोख्ता पैड दिखाया जो कि मेरे वीर्य और उसके खून से सना हुआ था।

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तो वो आश्चर्यचकित होते हुए मेरे पास आई और ‘आई लव यू’ कहते हुए मुझे चूमते हुए बोली- राहुल तुम सच में मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. तुम तो मुझे तो मालूम ही न चलने देते.. अगर मैं कुछ न कहती।

फिर वो अपने गाउन को उठा कर बोली- जान फिर तो उस दिन की तरह मुझे आज भी अपनी गांड भी फिर से मरवानी पड़ेगी.. ताकि अब दुबारा चूत की तरह गांड में भी दर्द न हो.. तुम एक काम करो.. मोबाइल में एक गेम और खेलो और मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूँ.. पर पहले इसे धोने के लिए डाल दूँ वरना क्या कहूँगी कि ये दाग कैसे पड़ा।

मैंने बोला- बोल देना महीना सोते में ही शुरू हो गया।

तो बोली- राहुल जब घर में बड़ी बेटी भी हो न.. तो ये सब छुपाने में दिक्कत होती है और महीना चार से पांच दिन चलता है.. इसको छुपाने के लिए और झूट बोलने पड़ेंगे.. तुम एक काम करो.. गेम खेलो मैं बस दस मिनट में गरमा-गरम चाय के साथ आती हूँ।

यह बोलकर माया चली गई।

फिर मैंने माया का फोन उठाया और उसके फ़ोन की गैलरी में जाकर रूचि की फोटो देखने लगा जो कि शायद रूचि के जन्मदिन की थी क्योंकि रूचि केक काट रही थी और वो उस दिन की ड्रेस में काफी आकर्षित करने वाली लग रही थी।

उसके हुस्न को देखते ही मेरे लौड़े में फिर से जान आने लगी थी।

किसी तरह मैंने लौड़े को मुठियाने से बचाया और वापस गेम खेलने लगा और जैसे ही स्नेक वाला गेम खेलने को खोला… मेरे दिमाग में आया क्यों न अपने फोन पर रूचि का नंबर कॉपी कर लूँ।

तो मैंने तुरंत ही अपना फोन उठाया और उसका नंबर टाइप करने लगा और जब तक में उसकी फोन कांटेक्ट डायरेक्टरी से निकालता.. तब तक माया आ गई और हड़बड़ी में काल लग गई.. जो कि पता न चला…

माया आते ही बोली- लो चाय पियो और दिमाग फ्रेश करके अपने खेल में फिर से मुझे भी शामिल कर लो।

तब तक रूचि ने फ़ोन काटकर उधर से काल की तो मैंने देखा कि रूचि का फोन इस समय कैसे आ गया।

मैंने ये सोचते हुए ही फोन माया की ओर बढ़ा दिया.. तो उसने जो भी बोला हो.. मैंने नहीं सुना पर माया बोली- अरे नींद नहीं आ रही थी तो मैं टीवी देख रही थी और मैंने समय देखने के लिए फोन उठाया था.. पता नहीं कैसे काल लग गई। खैर.. होगा ये बोलो अब तुम्हारी तबियत ठीक है न?

फिर उधर से कुछ कहा गया होगा जिसके जबाव में माया ने कहा- अच्छा चलो.. कल घर आओ.. फिर देखते हैं अगर सही नहीं लगेगा तो हम डॉक्टर के पास चलेंगे.. तुम अभी आराम करो.. बाय..

माया ने फोन काट दिया।

फिर माया फोन काटते ही मुझसे झुँझलाकर बोली- तुमने मेरे फ़ोन से काल क्यों की?

तो मैंने बोला- अरे मैं तो गेम खेल रहा था और हो सकता है.. रखते समय बटन दब गई होगी।

बोली- यार ये तो कहो उसने ज्यादा कुछ नहीं सुना बल्कि फोन काट कर मिला लिया.. वरना मैं उसको क्या बताती?

मैंने बोला- अब छोड़ो भी जो होना था हो गया.. चाय पियो और दिमाग को ठंडा रखो।

तो वो मुस्कुराते हुए बोली- ह्म्म्म्म्म वैसे भी तुम्हें गर्म पसंद है..

मैं बोला- अरे वाह मेरी जानू.. तुम तो बहुत अच्छे से मुझे जान चुकी हो कि मुझे गर्म चाय और उसको पिलाने वाली दोनों पसंद हैं।

फिर हम दोनों ने चाय पी और कुछ देर बैठे ही बैठे एक-दूसरे को बाँहों में लेकर प्यार भरी बातें करने लगे जिससे कुछ ही देर में माया फिर से गर्माते हुए बोली- राहुल मैं सोच रही हूँ जैसे मैंने शादी की पहली रात को तीन-चार बार किया था.. वैसे ही आज भी करूँ.. पता नहीं ये समा फिर कब इस तरह रंगीन हो।

ये कहते हुए उसने अपना हाथ मेरे लौड़े पर रख दिया और मेरी आँखों में देखते हुए मुझसे बात करते-करते मेरे लौड़े को मुठियाने लगी।

उसकी इस अदा पर में’ फ़िदा ही हो गया था.. आज भी जब कल्पना करता हूँ.. उसके खुले रेशमी बाल.. बड़ी आँखें उसके होंठ.. समझ लो आज भी बस यही सोचकर मुट्ठ मार लेता हूँ।

खैर.. अब कहानी में आते हैं..

तो मैं उसके इस रूप पर इतना मोहित हो गया कि बिना कुछ बोले बस एकटक उसे ही देखता रहा… जैसे कि मैं उसे अपनी कल्पनाओं में चोदे जा रहा हूँ.. और देखते ही देखते मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों से आक्रमण कर दिया और उसे बेतहाशा मदहोशी के आगोश में आकर चूमने चाटने लगा।
जिससे माया का भी स्वर बदल गया और उसकी बोलती बंद हो गई और बीच-बीच में बस ‘आआह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. ऊऊम्म’ के स्वर निकालने लगी।

मैं उसके चूचे ऐसे चूसे जा रहा था जैसे गाय के पास जाकर उसका बछड़ा उसके थनों से दूध चूसता है।

फिर कुछ देर बाद देखा तो वो भी मेरी ही तरह से पूरी तरह से मदहोशी के आगोश में आकर अपने दूसरे निप्पल को रगड़कर दबाते हुए, ‘आह्ह्ह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. उउउउउम..’ की ध्वनि निकाल रही थी.. जिससे कि मेरा जोश और बढ़ गया।

मैंने उसे वैसे ही लिटाया और उसके पैरों के बीच खड़ा होकर.. उसकी चूत में एक ही बार में लण्ड डालकर.. उसे जबरदस्त तरीके से गर्दन को बाएं हाथ से पलंग पर दबाकर तेज़ ठोकरों के साथ चोदने लगा।

माया की सीत्कार ‘आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह’ चीत्कार में बदल गई।

‘अह्ह्हह्ह.. बहुत मज़ा आ रहा है राहुल.. बस ऐसे ही करते आह्ह्ह्ह रहो..।’

देखते ही देखते माया का शरीर ढीला पड़ गया और मैं भी उसके साथ तो नहीं… पर उसके शांत होते ही अपने लौड़े का गर्म उबाल.. उगल दिया।

फिर उसके मम्मों पर सर रखकर आराम करने लगा।

सच बताऊँ दोस्तों इसमें हम दोनों को बहुत मज़ा आया था।

थोड़ी देर यू हीं लेटे रहने के बाद माया मेरे सर को अपने हाथों से सहलाते हुए चूमने लगी और बोली- राहुल तुम मेरे साथ जब भी.. कैसे भी.. करते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है और सुकून मिलता है.. मुझे अपना प्यार इसी तरह देते रहना।

मैंने बोला- तुमसे भी मुझे बहुत सुकून मिलता है.. तुम परेशान मत होना जान.. मैं हमेशा तुम्हें ऐसे ही प्यार देता रहूँगा।

फिर वो मुझे चूमते हुए बोली- आगे की तो जंग छुड़ा कर ऑयलिंग कर दी.. पर अब पीछे की बारी है।

तो मैंने हैरान होते हुए उसकी आँखों में झाँका.. तो वो तुरंत बोली- क्यों क्या हुआ.. ऐसा मैंने क्या बोल दिया.. जो इतना हैरान हो गए?

तो मैंने बोला- अरे कुछ नहीं..

वो बोली- है तो कुछ.. मुझसे न छिपाओ.. अब बोल भी दो।

तो मैंने बोला- अरे तुम्हारे पीछे दर्द होगा.. तो क्या बर्दास्त कर लोगी? मैंने देखा था.. महसूस भी किया था तुम्हें बहुत तकलीफ हुई थी।

तो मुस्कुराते हुए बोली- अले मेले भोलू लाम.. तुम सच में बहुत प्यारे हो.. मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. पर तुम्हें जानकर ख़ुशी होगी कि अब तालाब समुन्दर हो गई है.. चाहो तो खुद देख लो।

वो मेरा हाथ पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर रखते हुए बोली- खुद ही अपनी ऊँगली डालकर देख लो..

तो मैंने उसकी गांड में दो ऊँगलियां डालीं.. जो कि आराम से चली गईं।

कुछ देर बाद फिर जब मैंने तीन डालीं तो उसे हल्का सा दर्द महसूस हुआ..
पर वो बोली- चलो अब जल्दी से इस दर्द को भी दूर कर दो।

मैंने बोला- अच्छा.. फिर से तेल या मक्खन लगा लो।

तो वो बोली- अरे अब उसकी जरुरत नहीं है.. मैं हूँ न.. बस तुम सीधे होकर लेट जाओ।

फिर मैं सीधा ही लेट गया.. माया अपने हाथ से मेरे लण्ड को मुठियाते हुए मुँह में भरकर चूसने लगी.. जिससे मेरा लौड़ा फिर आनन्द की किश्ती में सवार हो कर झूम उठा और जब उसके मुँह से लौड़ा निकलता तो उसके माथे पर ऐसे टीप मारता.. जैसे कहता हो, ‘पगली.. ठीक से चूस..’

फिर मैंने माया को बोला- जल्दी से इसे ले लो.. वरना ये ऐसे ही उबाल खा कर भावनाओं के सागर में बह जाएगा।

तो माया ने भी वैसा ही किया और मुँह में ज्यादा सा थूक भरकर.. मेरे लौड़े को तरबतर करके.. खुद ही मैदान सम्हालते हुए मेरे ऊपर आ गई।

वो मेरे लौड़े को अपनी गांड के छेद पर टिका कर धीरे-धीरे नीचे को बैठने लगी और उसकी थूक की चिकनाई के कारण आराम से उसकी गांड ने मेरा पूरा लौड़ा निगल सा लिया था।

उसकी गांड की गर्माहट पाकर मेरे अन्दर मनोभावनाओं में फिर से तूफ़ान सा जाग उठा और मैं भी कमर चलाकर उसे नीच से ठोकते हुए लण्ड की जड़ तक उसकी गांड में डालने लगा।

इतना आनन्द भरा समा चल रहा था कि दोनों सब कुछ भूल कर एक-दूसरे को ठोकर मारने में लगे थे।

माया ऊपर से नीचे.. तो मैं नीचे से ऊपर की ओर कमर चला रहा था।
माया लगातार ‘अह्ह्हह्ह उउउउम..’ करते-करते चूत से पानी बहाए जा रही थी.. जिसकी कुछेक बूँदें मेरे पेट पर गिर चुकी थीं।
उसको इतना मज़ा आ रहा था कि बिना चूत में कुछ डाले ही चरमोत्कर्ष के कारण स्वतः ही उसकी चूत का बाँध छूट गया और उसका कामरस मेरे पेट पर ही गिरने लगा।

और देखते ही देखते माया ने निढाल सा होकर पलंग पर घुटने टिका कर.. लण्ड को अन्दर लिए ही मेरी छाती पर सर रख दिया और अपने हाथों से मेरे कंधों को सहलाने लगी।

जिससे मेरा जोश भी बढ़ने लगा और मैंने अपने हाथों से उसके चूतड़ों को पकड़ा और मज़बूती से पकड़ते हुए नीचे से जबरदस्त स्ट्रोक लगाते हुए उसकी गांड मारने लगा।

जिससे वो सीत्कार ‘श्ह्ह्ह्ह्ह्ह आआआअह..’ करते हुए जोश में आने लगी और मेरी छातियों को चूमने चाटने लगी।

मैंने रफ़्तार बढ़ा कर उसे चोदते हुए उसकी गांड में अपनी कामरस की बौछार कर दी।

झड़ने के साथ ही माया को अपनी बाँहों में जकड़ कर उसके सर को चूमते हुए उसे प्यार करने लगा।

ऐसा लग रहा था.. जैसे सारी दुनिया का सुख भोग कर आया हूँ।

फिर उस रात मैंने थोड़ी-थोड़ी देर रुक रूककर माया की गांड और चूत मारी.. करीब पांच बजे के आस-पास हम दोनों एक-दूसरे की बाँहों में निर्वस्त्र ही लिपटकर सो गए।

कहानी का यह भाग यहीं रोक रहा हूँ।
अब मैं क्या करूँगा.. जानने के लिए अगले भाग का इंतज़ार कीजिएगा।

सभी पाठकों के संदेशों के लिए धन्यवाद.. आपने अपने सुझाव मुझे मेरे मेल पर भेजे.. मेरे मेल पर इसी तरह अपने सुझावों को मुझसे साझा करते रहिएगा।

पुनः धन्यवाद।

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मेरी चुदाई की अभीप्सा की यह मदमस्त कहानी जारी रहेगी।
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