हवसनामा: सुलगती चूत-3

(Hawasnama: Sulagti Choot- Part 3)

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हम दोनों ने उस चरम अवस्था में इतनी जोर से एक दूसरे को भींचा था कि हड्डियां तक कड़कड़ा उठी थीं।
थोड़ी देर में संयत होने पर वह उठ कर मुझसे अलग हुआ तो उसका मुरझाया लिंग पुल्ल से बाहर आ गया और एकदम से वीर्य बाहर उबला जिसे मैंने हाथ लगा कर हाथ पर ले लिया कि बिस्तर न खराब हो।
“बाथरूम किधर है?” मैंने राजू की तरफ देखते हुए पूछा तो उसने बायीं तरफ एक बंद दरवाजे की तरफ संकेत कर दिया।

मैं उठ कर बाथरूम चली गयी … वहां सारा वीर्य फेंका, योनि में मौजूद वीर्य निकाला और फिर सर छोड़ के बाकी बदन पानी से अच्छे से धो लिया। मैं निकली तो वे दोनों एकसाथ ही बाथरूम में घुस गये।

थोड़ी देर बाद हम तीनों फिर बिस्तर पर थे।

“मजा आ गया … ऐसे ही फिर चोदो। इस बार वैसे भी जल्दी नहीं झड़ोगे तो दोनों मिल के मेरी चूत चोदो। एक निकालो तो दूसरा डाले … ऐसे ही चोदते-चोदते पागल कर दो मुझे।” मैंने उन दोनों को देखते हुए कहा।
“मुझे गांड भी मारनी है।” राजू ने कहा।

“इसके बाद वाले राउंड में सिर्फ गांड ही गांड मारना और पूरी भक्कोल कर के रख देना। इस बार बस चूत ही चूत चोदो और झड़ना चूत में नहीं, बल्कि जैसे ही झड़ने को होना मेरे मुंह में दे देना। मैं मुंह से ही सब साफ कर दूंगी।”
“कमाल है … ऐसी चुदैली औरत तो हमने बस ब्लू फिल्मों में ही देखी है।” रघु थोड़ी हैरानी से बोला।
“समझो, मैं वहीं से निकल के तुम लोगों के बीच पहुंच गयी हूँ। अब टाईम मत वेस्ट करो.. शुरू हो जाओ।”

वे भी समय की कीमत समझते थे। हम तीनों नंगे बदन फिर एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होने लगे। शारीरिक घर्षण फिर वासनात्मक आंच से शरीर को गर्म करने लगा। इस बार वे पहले की अपेक्षा कम हिंसक हो रहे थे लेकिन मैं उसके लिये भी उकसा रही थी। बार-बार उनके लिंग मुंह में ले कर बेरहमी से चूसने लगती। उनके मुंह में अपनी चूची घुसा देती, कहीं उनके मुंह पर चूत रख कर रगड़ने लगती।

बहुत ज्यादा देर नहीं लगी जब उनके लंड पूरे आकार में आ कर एकदम कठोर हो गये और मेरी चूत भी गीली हो कर बहने लगी।
“चलो अब शुरू हो जाओ। जैसे ब्लू फिल्मों में देखते हो, वैसे चोदना है … दोनों लोग बारी-बारी से बुर का भोसड़ा बना दो। जिसका लंड मुर्झाने लगे मेरे मुंह में दे दो, मैं टाईट कर दूंगी।”

शुरुआत चित लिटा कर चोदने से हुई। पहले राजू ने लंड घुसाया और घचाघच पेलने लगा। मैं हर धक्के पर जोर जोर से सिसकारते हुए उम्म्ह… अहह… हय… याह… उसे बकअप कर रही थी कि वह मुझे गालियां देता गंदी-गंदी बातें भी करता रहे। रघु का लंड कमजोर पड़ने लगा तो उसने मेरे मुंह में दे दिया और टाईट होते ही उसने राजू को हटा दिया और खुद चढ़ गया। अब उसके जोरदार धक्कों से चूत चरमराने लगी। मैंने भी आहों कराहों में कोई कसर नहीं उठा रखी थी।

राजू पहले तो मेरी घुंडियां मसलने चूसने में लगा रहा लेकिन जब उसे लगा कि उसकी उत्तेजना कम पड़ रही थी तो उसने मेरे ही रस से भीगा लंड मेरे मुंह में दे दिया जिसे मैं चपड़-चपड़ चूसने लगी।

जब इस पोजीशन में रघु भी अच्छे खासे धक्के लगा चुका तो आसन बदलने के लिये मैं औंधी हो गयी और एक टांग सीधी रखते, दूसरी टांग इस तरह ऊपर खींच ली कि चूत बाहर उभर आये। इस तरह राजू ने अपना लंड घुसा दिया और अब चूँकि मेरे चूतड़ उनके सामने थे तो उन पर तमांचे मारते उन्हें भी साथ में सहलाने लगा। मैं उस आनंद की पहले शायद सटीक कल्पना भी नहीं कर पाई थी जो मुझे इस वक्त मिल रहा था।

आनंद के अतिरेक से मेरी आंखें मुंद गयी थीं और मैं बस बेसाख्ता ही जोर-जोर से सिसकारे जा रही थी। मुझे इस बात की भी कोई परवाह नहीं थी कि आसपास कोई सुन लेगा। सुन लेगा तो सुन ले.. आज मैं चुद रही थी जो मेरी कब से आरजू थी इसलिये आज कोई बंधन स्वीकार्य नहीं था।

राजू को हटा कर खुद चढ़ने से पहले रघु ने मेरे मुंह में दे कर फिर से अपना लंड कड़ा कर लिया और फिर राजू की जगह वह आ गया और राजू मेरे पड़ोस में लेट कर मेरे होंठ, मेरी जीभ चूसने लगा। एक हाथ से मेरी एक चूची भी मसले जा रहा था।

यह आसन भी हो गया तो मैं उठ कर बिस्तर के किनारे अपनी गांड हवा में उठ कर झुक गयी और उनसे कहा कि अब वह नीचे खड़े हो कर पूरी ताकत से चोदें।

पहल राजू ने की … मेरे चूतड़ों को दबोच कर वह जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। उसकी सुविधा के लिये मैं खुद भी बार-बार चूतड़ पीछे करके उसके लंड को चूत में जड़ तक घुसने का मौका दे रही थी। कमरे में ‘फच-फच’ ‘थप-थप’ की मधुर ध्वनि के साथ मेरी मादक कराहें और उनकी जानवर जैसी हिंसक भारी सांसों के साथ ही उनकी गालियां और वे गंदी बातें भी गूंज रही थीं जो वे जोश बोले जा रहे थे।

यहां वे चोदने के लिये अपनी बारी में उतना टाईम नहीं ले रहे थे जितना पहले लिया था, बल्कि थोड़ी-थोड़ी देर में स्थान बदल रहे थे। जहां राजू का लंड समान मोटाई लिये था मगर लंबाई रघु से कम थी, वहीं रघु का लंड बच्चेदानी पर चोट करता लगता था जिसे बर्दाश्त करने में मेरी हालत खराब हुई जा रही थी।

इस बीच मैं झड़ भी चुकी थी और लंड खाते-खाते दुबारा भी गर्म हो गयी थी और अब फिर से उसी उफान पर थी जहां योनिभेदन करते लंड मुझे वापस चर्मोत्कर्ष तक पहुंचाये दे रहे थे।

“मेरा निकलने वाला है।” इस बार पहले रघु बोला और लंड निकालते मेरे मुंह की तरफ आ गया जबकि चूत खाली होते ही राजू ने अपना लंड पेल दिया था। रघु का लंड मैंने हलक की जड़ तक लेते जोर से दबा लिया … वह एकदम से फूला और बह चला। आगे पीछे उसने जो पिचकारी छोड़ी, वह सीधे हलक में उतरती चली गयी जिसका स्वाद भी मुझे न पता चला।

हां … बाद में लंड ढीला हुआ और थोड़ा बाहर निकला तो अंत की छोटी पिचकारी से उसके रस का नमकीन स्वाद मिला, जिसे अनुभव करते मैं हलक में उतार गयी और रघु ने हांफते हुए अपना लंड मेरे मुंह से निकाल लिया और बिस्तर पर फैल गया।

मेरी निमग्नता भंग होने से मेरा स्ख्लन भी डिले हो गया था, जिस पर वापस ध्यान दिया तो राजू के धक्के मुझे चरम सुख देने लगे और थोड़ी देर में मैं भी अकड़ गयी। मेरी योनि उसके लंड को भींचने लगी तो वह भी उत्तेजना के शिखर पर पहुंच गया और उसने भी जल्दी से लंड चूत से निकाल कर मेरे मुंह में ला ठूंसा। उसके साथ भी मैंने वही किया जो रघु के साथ किया था और वह भी कुछ पल बाद बिस्तर पर फैल गया।

अब अलग-अलग हम तीनों पड़े अपनी उखड़ी सांसें दुरुस्त कर रहे थे।
“बोलो … मैं तो बहुत भूखी थी। मुझमें अभी भी दम है, गांड मरवाने का। क्या तुम लोगों में दम है और लंड चलाने का या मैं पैकिंग करूँ?” मैंने चुनौती भरे अंदाज में कहा।

कोई आम हालात होते तो वे शायद मना कर देते लेकिन ऐसी खुली रांड सी औरत रोज कहां चोदने को मिलती है, वे इसका लोभ संवारण न कर सके।
“थोड़ा टाईम दो.. संभलने का। गांड भी मारेंगे और आज जब घर जाओगी तो महीनों इस चुदाई को भूले न भूल पाओगी।”
“मैं भी तो यही चाहती हूँ लेकिन गांड चूत के मुकाबले सख्त होती है। कुछ चिकनाहट का इंतजाम करना पड़ेगा।”
“कभी कभार हम यहीं खाना बनाते हैं तो सरसों का तेल ही है और कुछ नहीं।”
“वह भी चलेगा।”

करीब दस मिनट लगे उन्हें संभलने में … ज्यादा टाईम तो उन्हें मैं दे भी नहीं सकती थी। मैं खुद से उन पर चढ़ने, उन्हें चूमने चाटने लगी। उनके सोये मुरझाये लंडों को सहलाने चाटने लगी।

धीरे-धीरे उनमें गर्मी आने लगी और वे भी मूझसे लिपटने रगड़ने लगे। इस बार पहले वाली आक्रामकता गायब थी और उसका स्थान सौम्यता ने ले लिया था। उनके लंडों को जागने में टाईम भी ज्यादा लगा और करीब दस मिनट और खर्च हुए पूरी तरह तैयार होने में।

राजू तेल ले आया जिसकी फिलहाल मुझे जरूरत थी। मैंने दोनों के लंड उस तेल को चुपड़ कर एकदम चमका दिये और खुद औंधी लेट कर सिर्फ गांड वाले हिस्से को उभार दिया कि वे उसमें तेल लगा कर अपनी उंगलियों से चोदन करें।

उन्होंने भी पूरे चूतड़ तेल से चमका दिये और थोड़ा-थोड़ा तेल छेद में डालते और उंगली करते। यहां एक बात बता दूँ कि चूँकि पोर्न पढ़ और देख कर मैं खुद तरसती थी तो खुद अपनी उंगली, मोमबत्ती आदि से यह करती थी तो ऐसा भी नहीं था कि मेरी गांड का छेद इस चीज से अंजान था। वह उनकी उंगलियों को सहज रूप से स्वीकारने लगा। पहले एक उंगली, फिर दो और फिर तीन … ऐसा लगा जैसे गांड ही फट जायेगी।

“अब लंड डाल के फाड़ दो हरामियो!” मैंने खुद से अपने चूतड़ हिलाते और कुतिया की तरह होते, अपनी गांड उनके सामने पेश करते हुए कहा।

पहले राजू ने अपना लंड छेद पर टिका कर जोर डाला। जाहिर है कि चिकनाहट काफी थी तो रुकने का सवाल ही नहीं था। पूरा सुपाड़ा एकदम से सारी चुन्नटों को फैलाते हुए अंदर घुसा। ऐसा लगा जैसे गांड ही फट गयी हो … साथ ही ऐसा भी लगा जैसे गू ही निकल जायेगा लेकिन बर्दाश्त कर गयी और मुंह से बिलबिलाहट के साथ गालियां निकलने लगीं।

रघु थोड़ा होशियार खिलाड़ी साबित हुआ। उसने हाथ नीचे देकर चूत सहलानी और मेरे दाने को रगड़ना शुरू कर दिया। जिससे थोड़ी राहत मिली।
मैं चूत को मिलती राहत की तरफ ध्यान लगाने लगी और राजू ठेलता हुआ पूरा लंड अंदर कर गया। मोमबत्ती की बात और थी, एक मोटे लंड के लिहाज से यह अनुभव ऐसा था जैसे जोर की हगास लगी हो और जब उसने अपने लंड को बाहर खींचा तो हगने जैसी ही फीलिंग आई … लेकिन टोपी तक खींच कर उसने फिर वापस पूरा अंदर ठेल दिया।

मेरे मुंह से फिर गाली निकल गयी।

आठ दस बार करने के बाद उसने फिर बाहर ही निकाल लिया और बताया कि उसमें गू भी लगा हुआ था, जिसे उसने साफ किया और फिर से तेल लगाया, जबकि अब उसकी जगह रघु ने अंदर ठांस दिया था और वक्ती राहत फौरन ही दफा हो गयी थी। उसने एक समझदारी यह की थी कि पूरा ठांसने के बजाये आधा ही डाला और धीरे-धीरे अंदर बाहर खींचने लगा।

करीब दस मिनट तो लग ही गये होंगे मुझे संभलने में। इस बीच कभी यह कभी वह और कभी मैं खुद अपनी चूत और दाने को सहलाती रगड़ती रही कि मेरी उत्तेजना बनी रहे। दस मिनट बाद वह वक्त भी आया जब छेद इतना ढीला पड़ गया कि उनके लंड आसानी से अंदर बाहर होने लगे तब मुझे थोड़ा मजा आना शुरू हुआ।

चूँकि वे दो बार झड़ चुके थे तो जल्दी झड़ने का तो सवाल ही नहीं था, फिर वे जगह भी जल्दी-जल्दी बदल रहे थे तो और टाईम लगना था।

एक बार जब मैंने एडजस्ट कर लिया और अपनी गांड मराई एंजाय करने लगी तब हमने आसन चेंज करने शुरू किये और जिन-जिन आसन में उन्होंने मेरी चूत चोदी थी, उन-उन आसन से उसी अंदाज में गांड भी मारने लगे। मुझे अच्छा लग रहा था, मजा आ रहा था और उत्तेजित भी खूब हो रही थी लेकिन यह और बात थी कि एनल में मैं आर्गेज्म तक न पहुंच पाई।

जबकि वे आखिरकार आधे घंटे तक गांड मारते-मारते चरम पर पहुंच गये और इस बार चूँकि मेरी शुरुआती गर्मी निकल चुकी थी तो मैं मुंह में निकलवाने का साहस भी न कर पाई और दोनों को गांड में ही झड़वा लिया।

अंत में राजू के फारिग होते ही मैं टायलेट भागी और हगने के साथ उनका सारा माल बाहर निकाला।

अब मैं भी निढाल हो चुकी थी और वे भी। टाईम भी हो चुका था। बिना ब्रा और पैंटी के ही कपड़े पहन कर मैंने विदाई ली और अपने टाईम से थोड़ा लेट सही पर घर पहुँच गयी।

यह चुदाई यादगार थी.. मेरे बदन पर उनकी निशानियां महीने भर रही थीं और दोनों छेद सूज गये थे। मूतने में तो नहीं पर हगने में जरूर दो चार दिन समस्या रही। मैंने सोचा था कि महीने में एकाध बार यह महफिल जमा लिया करूँगी लेकिन फिर एक दिन मेरी आकांक्षाओं पर तुषारपात हो गया जब रघू का फोन आया कि वह मुलुक लौट रहा है। उसके घर कोई हादसा हो गया है। अब पता नहीं कब तक लौटे।

हालाँकि राजू का एक ऑप्शन तो था पर उसका नंबर मेरे पास नहीं था और रघु से लेती भी तो क्या पता उसके पार्टनर वापस आ चुके हों और वे कैसे हों। मुझे दो तरह के लोगों से डर लगता है जो आपकी पर्सनल लाईफ को डिस्टर्ब कर देते हैं … एक वे कुंवारे लौंडे जो फौरन दिल लगा बैठते हैं और दूसरे वे पजेसिव नेचर के मर्द जो किसी औरत को अपनी पर्सनल प्रापर्टी समझ लेते हैं … इनके सिवा मुझे हर मर्द स्वीकार है।

अब तीन महीने फिर हो रहे हैं … उस आक्रामक चुदाई के अहसास हल्के पड़ चुके हैं। मेरी योनि फिर सुलगने और लिंग मांगने लगी है। मैं फिर चुदने के पीछे वापस पागल सी होने लगी हूँ … काश … काश कि मुझे मुंबई में ही और खास कर सबर्ब में कोई अपने जैसा भूखा मर्द मिल जाता जो मुझे निचोड़ कर रख देता लेकिन मेरी पर्सनल लाईफ का भी ख्याल रखता कि वह इफेक्ट न हो।
काश!

दोस्तो … पारुल की कहानी उसके ‘काश’ के साथ यहीं खत्म होती है और अगर आपके पास भी ऐसी ही कोई रूचिकर कहानी है जो आप अपनी गोपनीयता के साथ इस मंच पर शेयर करना चाहते हैं और किसी वजह से ऐसा नहीं कर पा रहे तो मुझे बता सकते हैं। मुझे वह कहानी, वह अनुभव, वह आपबीती इस लायक लगी तो मैं उसे अपने शब्दों में पिरो कर पेश कर दूंगा। मेरी मेल आईडी और फेसबुक एड्रेस नीचे लिखा है.
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